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Mantra Rig 01.073.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 73 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 19 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 84 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

दे॒वो यः पृ॑थि॒वीं वि॒श्वधा॑या उप॒क्षेति॑ हि॒तमि॑त्रो॒ राजा॑ पु॒र॒:सद॑: शर्म॒सदो॒ वी॒रा अ॑नव॒द्या पति॑जुष्टेव॒ नारी॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

देवो यः पृथिवीं विश्वधाया उपक्षेति हितमित्रो राजा पुरःसदः शर्मसदो वीरा अनवद्या पतिजुष्टेव नारी

 

The Mantra's transliteration in English

devo na ya pthivī viśvadhāyā upaketi hitamitro na rājā | purasada śarmasado na vīrā anavadyā patijuṣṭeva nārī 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

दे॒वः यः पृ॒थि॒वीम् वि॒श्वऽधा॑याः उ॒प॒ऽक्षेति॑ हि॒तऽमि॑त्रः॑ राजा॑ पु॒रः॒ऽसदः॑ श॒र्म॒ऽसदः॑ वी॒राः अ॒न॒व॒द्या पति॑जुष्टाऽइव नारी॑

 

The Pada Paath - transliteration

deva | na | ya | pthivīm | viśva-dhāyā | upa-keti | hita-mitra | na | rājā | pura-sada | śarma-sada | na | vīrā | anavadyā | patijuṣṭāiva | nārī 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०७३।०३

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर भी विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(देवः) दिव्यसुखदाता (न) इव (यः) सर्वोपकारको विद्वान् (पृथिवीम्) भूमिम् (विश्वधायाः) यो विश्वं दधाति। अत्र विश्वोपपदाद्बाहुलकादसुन् युडागमश्च। (उपक्षेति) विजानाति निवासयति वा (हितमित्रः) हित धृता मित्राः सुहृदो येन सः (नः) इव (राजा) सभाध्यक्षः (पुरःसदः) ये पूर्वं सीदन्ति शत्रून् हिंसन्ति वा (शर्म्मसदः) ये शर्मणि सुखे सीदन्ति ते (न) इव (वीराः) शत्रूणां प्रक्षेप्तारः (अनवद्या) विद्यासौन्दर्यादिशुभगुणयुक्ता (पतिजुष्टेव) पतिजुष्टः प्रीतः सेवितो यया तद्वत् (नारी) नरस्येयं विवाहिता भार्य्या ॥३॥

हे मनुष्यो ! तुम लोग (यः) जो (देवः) अच्छे सुखों का देनेवाला परमेश्वर वा विद्वान् (पृथिवीम्) भूमि के समान (विश्वधायाः) विश्व को धारण करनेवाले (हितमित्रः) मित्रों को धारण किये हुए (राजा) सभा आदि के अध्यक्ष के (न) समान (उपक्षेति) जानता वा निवास कराता है तथा (पुरःसदः) प्रथम शत्रुओं को मारने वा युद्ध के जानने (शर्म्मसदः) सुख में स्थिर होने और (वीराः) युद्ध में शत्रुओं के फेंकनेवाले के (न) समान तथा (अनवद्या) विद्यासौन्दर्यादि शुद्धगुणयुक्त (नारी) नर की स्त्री (पतिजुष्टेव) जो कि पति की सेवा करनेवाली उसके समान सुखों में निवास कराता है, उसको सदा सेवन करो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यूयं यो देवः पृथिवीं न विश्वधाया हितमित्रो राजा नोपक्षेति पुरःसदः शर्म्मसदो वीरा न दुःखानि शत्रून् विनाशयति। अनवद्या पतिजुष्टेव सुखे निवासयति तं सदा समाहिता भूत्वा यथावत्परिचरत ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। न खलु मनुष्याः परमेश्वरेण विद्वद्भिः सह प्रेम्णा सह वर्त्तमानेन विना सर्व बलं सुख च प्राप्तमर्हन्ति तस्मादेताभ्यां साकं प्रीतिं सदा कुर्वन्तु ॥३॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य लोग परमेश्वर वा विद्वानों के साथ प्रेम प्रीति से वर्त्तने के विना सब बल वा सुखों को प्राप्त नहीं हो सकते, इससे इन्होंके साथ सदा प्रीति करें ॥३॥

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