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Mantra Rig 01.070.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 70 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 14 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 55 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- पङ्क्तिः

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

हि क्ष॒पावाँ॑ अ॒ग्नी र॑यी॒णां दाश॒द्यो अ॑स्मा॒ अर॑  सू॒क्तैः ॥ ए॒ता चि॑कित्वो॒ भूमा॒ नि पा॑हि दे॒वानां॒ जन्म॒ मर्ताँ॑श्च वि॒द्वान् 

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

हि क्षपावाँ अग्नी रयीणां दाशद्यो अस्मा अरं सूक्तैः ॥ एता चिकित्वो भूमा नि पाहि देवानां जन्म मर्ताँश्च विद्वान् 

 

The Mantra's transliteration in English

sa hi kapāvām̐ agnī rayīā dāśad yo asmā ara sūktaietā cikitvo bhūmā ni pāhi devānā janma martām̐ś ca vidvān 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः हि क्ष॒पाऽवा॑न् अ॒ग्निः र॒यी॒णाम् दाश॑त् यः अ॒स्मै॒ अर॑म् सु॒ऽउ॒क्तैः  ए॒ता  चि॒कि॒त्वः॒  भूम॒  नि  पा॒हि॒  दे॒वाना॑म्  जन्म॑  मर्ता॑न्  च॒  वि॒द्वान् 

 

The Pada Paath - transliteration

sa | hi | kapāvān | agni | rayīām | dāśat | ya | asmai | aram | su-uktaiḥ etā | cikitva | bhūma | ni | pāhi | devānām | janma | martān | ca | vidvān 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–७०।० ०६

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह मनुष्य कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(सः) परमेश्वरो जीवो वा (हि) खलु (क्षपावान्) क्षपाः प्रशस्ता रात्रयो विद्यन्ते यस्मिन् यस्य वा सः (अग्निः) यथा सर्वसुखदात्री विद्युत् (रयीणाम्) विद्यारत्नराज्यादिपदार्थानाम् (शत्) दाश्यात् (यः) उक्तार्थः (अस्मै) प्रापणाय (अरम्) अलम् (सूक्तैः) शोभनान्युक्तानि वचनानि येषूपदेशनेषु तेषु (एता) एतानि (चिकित्वः) ज्ञानवन् (भूम) भूमानि बहूनि (नि) नितराम् (पाहि) रक्ष (देवानां) दिव्यानां गुणांना विदुषां वा (जन्म) प्रादुर्भावम् (मर्तान्) मनुष्यान् (च) समुच्चये (विद्वान्) यो वेत्ति सः ॥ 

हे (चिकित्वः) ज्ञानवान् जगदीश्वर वा (विद्वान्) जाननेवाले ! (यः) जो (क्षपावान्) जिसमें उत्तम बहुत रात्रि हैं (अग्निः) सब सुखों की देनेवाली बिजुली के समान (अस्मै) इन (रयीणाम्) विद्यारत्न राज्य आदि पदार्थों की (अरम्) पूर्णप्राप्ति के लिये (एता) इन (अरम्) पूर्ण (सूक्तैः) उत्तम वचनों से (भूम) बहुत (देवानाम्) दिव्यगुण वा विद्वानों के (जन्म) जन्म (मर्त्तान्) मनुष्य (च) मनुष्य से भिन्नों को (दाशत्) देते हो (सः) सो आप (हि) निश्चय करके इनकी (नि पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये  

 

अन्वयः-

हे चिकित्वो विद्वान् ! यस्त्वं क्षपावानग्निरिवास्मै रयीणामरं प्रापणायैतान् परं सूक्तैर्भूम देवानां जन्म र्ताँश्चादन्यश्च दाशत्स त्वं हि खल्वेतानि निपाहि  

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यः परमेश्वरो [विद्वान् वा] वेदान्तर्यामित्वद्वारोपदेशैर्वा सर्वा विद्या सर्वमनुष्येभ्यः प्रयच्छति स एवोपास्यः सङ्गमनीयश्चेति ॥ 

इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को जो परमेश्वर वा विद्वान् वेद वा अन्तर्यामि द्वारा तथा उपदेशों से सब मनुष्यों के लिये सब विद्याओं को देता है, उसकी उपासना तथा सत्सङ्ग करना चाहिये ॥ 

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