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Mantra Rig 01.070.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 70 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 14 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 54 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- विराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अद्रौ॑ चिदस्मा अ॒न्तर्दु॑रो॒णे वि॒शां विश्वो॑ अ॒मृत॑: स्वा॒धीः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अद्रौ चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां विश्वो अमृतः स्वाधीः

 

The Mantra's transliteration in English

adrau cid asmā antar duroe viśā na viśvo amta svādhī ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अद्रौ॑ चित् अ॒स्मै॒ अ॒न्तः दु॒रो॒णे वि॒शाम् विश्वः॑ अ॒मृतः॑ सु॒ऽआ॒धीः

 

The Pada Paath - transliteration

adrau | cit | asmai | anta | duroe | viśām | na | viśva | amta | su-ādhīḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–७०।० - ०४

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(गर्भः) स्तोतव्योऽन्तःस्थो वा (यः) परमात्मा जीवात्मा वा (अपाम्) प्राणानां जलानां (गर्भः) गर्भइव वर्त्तमानः (वनानाम्) संभजनीयानां पदार्थानां रश्मीनां वा (गर्भः) गूढ इव स्थितः (च) समुच्चये (स्थाताम्) स्थावराणाम्। अत्र वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति तुक्। (गर्भः) गर्भ इवावृतः (चरथाम्) जङ्गमानाम्। अत्र वाच्छन्दसीति नुडागमाभावः। (अद्रौ) शंलादौ घने पदार्थे (चित्) अपि (अस्मै) जगदुपकाराय कर्मभोगाय वा (अन्तः) मध्ये (दुरोणे) गृहे (विशाम्) प्रजानाम् (न) इव (विश्वः) अखिलश्चेतनस्वरूपः (अमृतः) अनुत्पन्नत्वान्नाशरहितः (स्वाधीः) यः सुष्ठु समन्ताद्ध्यायति सर्वान्पदार्थान् सः ॥ - 

हम लोग जो जगदीश्वर वा जीव (अपाम्) प्राण वा जलों के (अन्तः) बीच (गर्भः) स्तुति योग्य वा भीतर रहनेवाला (वनानाम्) सम्यक् सेवा करने योग्य पदार्थ वा किरणों में (गर्भः) गर्भ के समान आच्छादित (अद्रौ) पर्वत आदि बड़े-बड़े पदार्थों में (चित्) भी गर्भ के समान (दुरोणे) घर में गर्भ के समान (विश्वः) सब चेतन तत्त्वस्वरूप (अमृतः) नाशरहित (स्वाधीः) अच्छी प्रकार पदार्थों का चिन्तवन करनेवाला (विशाम्) प्रजाओं के बीच आकाश वायु के (न) समान बाह्यदेशों में भी सब दिव्य गुण कर्मयुक्त व्रतों को (अश्याः) प्राप्त होवे (अस्मै) उसके लिये सब पदार्थ हैं, उसका (आवनेम) सेवन करें ॥ - 

 

अन्वयः-

यो जगदीश्वरो जीवो वा यथाऽपामन्तर्गर्भो वनानामन्तर्गर्भः स्थातामन्तर्गर्भश्चरथामन्तर्गर्भोऽद्रौ चिदन्तर्गर्भो दुरोणेऽन्तर्गर्भो विश्वोऽमृतः स्वाधीर्विशा प्रजानामन्तराकाशोऽग्निर्वायुर्नेव सर्वेषु च बाह्यदेशेष्वपि विश्वानि दैव्यानि व्रतान्यश्याव्याप्तोऽस्त्यस्मै सर्वे पदार्थाः सन्ति तं वयं वनेम ॥ - 

 

 

भावार्थः-

अत्र श्लेषालङ्कारः। (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इति पञ्चपदानां पूर्वस्मान्मन्त्रादनुवृत्तिश्च। मनुष्यैर्नहि चिन्मयेन परमेश्वरेण विना किंचिदपि वस्त्वव्याप्तमस्ति। नहि चिन्मयो जीवः स्वकर्मफलभोगविरह एकक्षणमपि वर्त्तते तस्मात्तं सर्वाभिव्याप्तमन्तर्यामिणं विज्ञाय सर्वदा पापकर्माणि त्यक्त्वा धर्म्यकार्य्येषु प्रवर्त्तितव्यम्। यथा पृथिव्यादिककार्य्यरूपाः प्रजा अनेकेषां तत्वानां संयोगेनोत्पन्ना वियोगेन विनष्टाश्च भवन्ति तथैव ईश जीवकारणाख्याअनादित्वात्संयोगविभागेभ्यः पृथक्त्वादनादयो सन्तीति वेदितव्यम् ॥ - 

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। पूर्व मन्त्र से (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इन पांच पदों की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को ज्ञानस्वरूप परमेश्वर के विना कोई भी वस्तु अव्याप्त नहीं है और चेतनस्वरूप जीव अपने कर्म के फलभोग से एकक्षण भी अलग नहीं रहता इससे उस सबमें अभिव्याप्त अन्तर्य्यामी ईश्वर को जानकर सर्वदा पापों को छोड़कर धर्मयुक्त कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे पृथिवी आदि कार्यरूप प्रजा अनेक तत्त्वों के संयोग से उत्पन्न और वियोग से नष्ट होती है वैसे यह ईश्वर जीव कारणरूप आदि वा संयोग-वियोग से अलग होने से अनादि है ऐसा जानना चाहिये ॥ - 

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