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Mantra Rig 01.068.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 68 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 9 of Varga 12 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 39 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- Dvipadaa viraat

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

पि॒तुर्न पु॒त्राः क्रतुं॑ जुषन्त॒ श्रोष॒न्ये अ॑स्य॒ शासं॑ तु॒रास॑: ॥ वि राय॑ और्णो॒द्दुर॑पुरु॒क्षुः पि॒पेश॒ नाकं॒ स्तृभि॒र्दमू॑नाः 

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

पितुर्न पुत्राः क्रतुं जुषन्त श्रोषन्ये अस्य शासं तुरासः ॥ वि राय और्णोद्दुरः पुरुक्षुः पिपेश नाकं स्तृभिर्दमूनाः 

 

The Mantra's transliteration in English

pitur na putrā kratu juanta śroan ye asya śāsa turāsavi rāya aurod dura puruku pipeśa nāka stbhir damūnā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

पि॒तुः पु॒त्राः क्रतु॑म् जु॒ष॒न्त॒ श्रोष॑न् ये अ॒स्य॒ शास॑म् तु॒रासः॑  वि  रायः॑  औ॒र्णो॒त्  दुरः॑  पु॒रु॒ऽक्षुः  पि॒पेश॑  नाक॑म्  स्तृऽभिः॑  दमू॑नाः 

 

The Pada Paath - transliteration

pitu | na | putrā | kratum | juanta | śroan | ye | asya | śāsam | turāsavi | rāya | aurot | dura | puru-ku | pipeśa | nākam | st-bhi | damūnāḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–६८।० 

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

फिर वे पढ़ने और पढ़ाने हारे कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(पितुः) जनकस्य () इव (पुत्राः) औरसाः। पुत्रः पुरुत्रायते निपरणाद्वा पुं नरकं ततस्त्रायत इति वा। निरु० १।११। (क्रतुम्) कर्म प्रज्ञां वा (जुषन्त) सेवन्ताम् (श्रोषन्) श्रृण्वन्तु (ये) मनुष्याः (अस्य) जगदीश्वरस्याप्तस्य वा (शासम्) शासनम् (तुरासः) शीघ्रकारिणः (वि) विशेषार्थे (रायः) धनानि (और्णोत्) स्वीकरोति (दुरः) हिंसकान् (पुरुक्षुः) पुरूणि क्षूण्यन्नानि यस्य सः (पिपेश) पिशत्यवयवान् प्राप्नोति (नाकम्) बहुसुखम् (स्तृभिः) प्राप्तव्यैर्गुणैः (दमूनाः) उपशमयुक्तः। दमूना दममना वा दानमना वा दान्तमना वा। निरु० ४।४। ॥ 

(ये) जो (तुरासः) अच्छे कर्मों को शीघ्र करनेवाले मनुष्य (पितुः) पिताके (पुत्राः) पुत्रों के (न) समान (अस्य) जगदीश्वर वा सत्पुरुष की (शासम्) शिक्षा को (श्रोषन्) सुनते हैं वे सुखी होते हैं, जो (दमूनाः) शान्तिवाला (पुरुक्षुः) बहुत अन्नादि पदार्थों से युक्त (स्तृभिः) प्राप्त करने योग्य गुणों से (रायः) धनों के (व्यौर्णोत्) स्वीकारकर्त्ता तथा (नाकम्) सुख को स्वीकार कर और (दुरः) हिंसा करनेवाले शत्रुओं के (पिपेश) अवयवों को पृथक्-पृथक् करता है उसी की सेवा सब मनुष्य करें  

 

अन्वयः-

ये तुरासो मनुष्याः पितुः पुत्रानेवास्य शासं श्रोषन् श्रृण्वन्ति ते सुखिनो भवन्तु। यो दमूनाः पुरुक्षुः स्तृभीरायो व्यौर्णोन्नाकं दुरः पिपेश सर्वैर्मनुष्यैः सेवनीयः  

 

 

भावार्थः-

अत्र श्लेषोपमालङ्कारौ। मनुष्यैर्नहीश्वराप्ताज्ञापालनेन विना कस्याचित् किंचिदपि सुखं प्राप्तुं शक्नोति नहि जितेन्द्रियत्वादिभिर्विना कश्चित्सुखं प्राप्तुमर्हति। तस्मादेतत्सर्व सर्वदा सेवनीयम्   

अत्रेश्वराग्निगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥

इत्यष्टषष्टितमं सूक्तं द्वादशो वर्गश्च समाप्तः ॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की आज्ञा पालने विना किसी मनुष्य का कुछ भी सुख का सम्भव नहीं होता तथा जितेन्द्रियता आदि गुणों के विना किसी मनुष्य को सुख प्राप्त नहीं हो सकता, इससे ईश्वर की आज्ञा और जितेन्द्रियता आदि का सेवन अवश्य करें  ॥   

इस सूक्त में ईश्वर और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ 

यह अड़सठवां सूक्त और बारहवां वर्ग समाप्त हुआ ॥

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