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Mantra Rig 01.065.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 65 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 9 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- Dvipadaa viraat

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अत्यो॒ नाज्म॒न्त्सर्ग॑प्रतक्त॒: सिन्धु॒र्न क्षोद॒: ईं॑ वराते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अत्यो नाज्मन्त्सर्गप्रतक्तः सिन्धुर्न क्षोदः ईं वराते

 

The Mantra's transliteration in English

atyo nājman sargapratakta sindhur na koda ka ī varāte ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अत्यः॑ अज्म॑न् सर्ग॑ऽप्रतक्तः सिन्धुः॑ क्षोदः॑ कः इ॒म् व॒रा॒ते॒

 

The Pada Paath - transliteration

atya | na | ajman | sarga-pratakta | sindhu | na | koda | ka | im | varāte ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–६५।५- 

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृशोऽस्तीत्युपदिश्यते।

फिर वह परमात्मा कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

 

पदार्थः-

(पुष्टिः) शरीरन्द्रियात्मसौख्यवर्द्धिका (न) इव (रण्वा) या रण्वति सुखं प्रापयति सा (क्षितिः) क्षियन्ति निवसन्ति राज्यरत्नानि प्राप्नुवन्ति यस्यां सा (न) इव (पृथ्वी) भूमिः (गिरिः) मेघः (न) इव (भुज्म) सुखानां भोजयिता (क्षोदः) जलम् (न) इव (शंभु) सुखसम्पादकम् (अत्यः) साधुरश्वः (न) इव (अज्मन्) मार्गे (सर्गप्रतक्तः) यः सर्गमुदकं प्रतनक्ति संकोचयति सः। सर्गत्युदकना०। निघं० १।१२। (सिन्धुः) समुद्रः (न) इव (क्षोदः) जलसमूहः (कः) कश्चिदपि (ईम्) ज्ञातव्यं प्राप्तव्यं परमेश्वरं विद्युद्रू पमग्नि वा (वराते) ॥५ - 

जो मनुष्य उस परमेश्वर को (रण्वा) सुख से प्राप्त करानेवाला (पुष्टिः) शरीर आत्मा और इन्द्रियों की पुष्टि के (न) समान (क्षोदः) जल (शम्भु) सुख सम्पन्न करनेवाले के (न) समान तथा (अज्मन्) मार्ग में (अत्यः) घोड़े के समान (सर्गप्रतक्तः) जल को संकोच करनेवाले (सिन्धुः) (क्षोदः) जलके (न) समान (ईम्) जनाने तथा प्राप्त करने योग्य परमेश्वर वा बिजुलीरूप अग्नि को (कः) कौन विद्वान् मनुष्य (वराते) स्वीकार करता है ॥५ - 

 

अन्वयः-

यस्तमेतं परमात्मनं रण्वा पुष्टिर्नेव क्षितिः पृथ्वी नेव गिरिर्भुज्मनेव क्षोदः शंभु नेवाऽज्मन्नत्यो नेव सर्गप्रतक्तः क्षोदो नेव को वराते वृणुते स पूर्णविद्यो भवति ॥५ - 

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। कश्चिदेव मनुष्यः परमेश्वरस्य प्राप्ति विद्युतो विज्ञानोपकरणं कर्त्तुं शक्नोति। यथा सर्वोत्तमा पुष्टिः पृथ्वीराज्यं मेधवृष्टिरुत्तममुदकं श्रेष्ठोऽश्वः समुद्रश्च बहूनि सुखानि ददाति। तथैव परमेश्वरो विद्युच्च सर्वानन्दान् प्रापयतः परन्त्वेतं ज्ञाता महाविद्वान् मनुष्यो दुर्लभो भवति ॥५ - 

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई विद्वान् मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त होके और बिजुलीरूप अग्नि जानके उससे उपकार लेने को समर्थ होता है जैसे उत्तम पुष्टि, पृथिवी का राज्य, मेघ की वृष्टि, उत्तम घोड़े और समुद्र बहुत सुखों को प्राप्त कराते है वैसे ही परमेश्वर और बिजुली भी सब आनन्दों को प्राप्त कराते हैं परन्तु इन दोनों का जाननेवाला विद्वान् मनुष्य दुर्लभ हैं ॥५ - 

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