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Mantra Rig 01.065.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 65 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 9 of Adhyaya 5 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Anuvaak 12 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- पराशरः शाक्तः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- विराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वर्ध॑न्ती॒माप॑: प॒न्वा सुशि॑श्विमृ॒तस्य॒ योना॒ गर्भे॒ सुजा॑तम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वर्धन्तीमापः पन्वा सुशिश्विमृतस्य योना गर्भे सुजातम्

 

The Mantra's transliteration in English

vardhantīm āpa panvā suśiśvim tasya yonā garbhe sujātam ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वर्ध॑न्ति ई॒म् आपः॑ प॒न्वा सुऽशि॑श्विम् ऋ॒तस्य॑ योना॑ गर्भे॑ सुऽजा॑तम्

 

The Pada Paath - transliteration

vardhanti | īm | āpa | panvā | su-śiśvim | tasya | yonā | garbhe | su-jātam ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।–६५। - 

मन्त्रविषयः-

पुनस्तं कीदृशं विजानीम इत्युपदिश्यते।

फिर उसको किस प्रकार का हम लोग जान, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(ऋतस्य) सत्यस्वरूपस्य (देवाः) विद्वांसः (अनु) पश्चात् (व्रता) सत्यभाषणादीनि व्रतानि (गुः) गच्छन्ति। अत्राडभावो लडर्थे लुङ् च। (भुवत्) भवति (परिष्टिः) परितः पर्वतः इष्टिरन्वेषणं यस्याः सा। अत्र एमआदिषु पररूपं वक्तव्यम्। ६।१।९४। इति वात्तिकेन पररूप एकादेशः। इति वालिकेन पररूपएकादेशः। (द्यौः) सूर्यद्युतिः (न) इव (भूम) भवेम (वर्धन्ति) वर्धन्ते। अत्र व्यत्ययेन परस्मैपदम्। (ईम्) पृथिवीम् (आपः) जलानि (पन्वा) स्तुत्येन कर्मणा (सुशिश्विम्) सुष्ठुवर्धकम्। छन्दसि सामान्येन विधानादत्र किः प्रत्ययः। (ऋतस्य) सत्यस्य कारणस्य (योना) योनौ निमित्ते सति (गर्भे) सर्वपदार्थान्तःस्थाने (सुजातम्) सुष्ठुप्रसिद्धम् ॥ - 

हे मनुष्यो ! (न) जैसे विद्वान् लोग (परिष्टिः) सब प्रकार खोजने योग्य (द्यौः) सूर्य्य के प्रकाश के तुल्य (भुवत्) होकर सब पदार्थों को दृष्टिगोचर करते हैं, वैसे (ऋतस्य) सत्यधर्म स्वरूप आज्ञा विज्ञान से (व्रता) सत्यभाषण आदि नियमों को (अनुगुः) प्राप्त होकर आचरण करते हैं तथा जैसे ये (ऋतस्य) कारणरूपी सत्य की (योना) योनि अर्थात् निमित्त में स्थित (सुजातम्) अच्छी प्रकार प्रसिद्ध (सुशिश्विम्) अच्छे पढ़ानेवाले सभापति की (पन्वा) स्तुति करने योग्य कर्म्म से (ईम्) पृथिवी को (आपः) जल वा प्राण को (वर्धन्ति) बढ़ाकर ज्ञानयुक्त कर देते हैं, वैसे हम लोग (भूम) होवें और तुम भी होओ  - 

 

अन्वयः-

हे मनुष्याः ! देवा विद्वांसः परिष्टिः द्यौर्भुवन्नेवर्त्तस्य व्रताऽनुगुरनुगम्याचरन्ति। यथैतऋतस्य योना स्थितं सुजातं सुशिश्विं सभेशं पन्वा वर्धन्ति विद्युतमीं पृथिवीं चापश्च तथैव वयं भूम भवेम यूयमपि भवत  - 

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्या यथा सूर्य्यप्रकाशेन सर्वे पदार्थाः सदृश्या भवन्ति तथैव विदुषां संगेन वेदविद्यायां जातायां धर्माचरणे कृते परमेश्वरो विद्युदाद्यश्च स्वगुणकर्मस्वभावः सम्यग्दृष्टा भवन्तीति यूयं विजानीत  - 

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य के प्रकाश से सब पदार्थ इष्टि में आते हैं वैसे ही विद्वानों के संग से वेदविद्या के उत्पन्न होने और धर्म्माचरण की प्रवृत्ति में परमेश्वर और बिजुली आदि पदार्थ अपने-अपने गुण, कर्म, स्वभावों से अच्छे प्रकार देखे जाते है, ऐसा तुम लोग जानकर अपने विचार से निश्चित करो  - 

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