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Mantra Rig 01.061.015

MANTRA NUMBER:

Mantra 15 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 29 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 36 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्मा इदु॒ त्यदनु॑ दाय्येषा॒मेको॒ यद्व॒व्ने भूरे॒रीशा॑नः प्रैत॑शं॒ सूर्ये॑ पस्पृधा॒नं सौव॑श्व्ये॒ सुष्वि॑माव॒दिन्द्र॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद्वव्ने भूरेरीशानः प्रैतशं सूर्ये पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्विमावदिन्द्रः

 

The Mantra's transliteration in English

asmā id u tyad anu dāyy eām eko yad vavne bhūrer īśāna | praitaśa sūrye paspdhāna sauvaśvye suvim āvad indra 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै इत् ऊँ॒ इति॑ त्यत् अनु॑ दा॒यि॒ ए॒षा॒म् एकः॑ यत् व॒व्ने भूरेः॑ ईशा॑नः प्र एत॑शम् सूर्ये॑ प॒स्पृ॒धा॒नम् सौव॑श्व्ये सुष्वि॑म् आ॒व॒त् इन्द्रः॑

 

The Pada Paath - transliteration

asmai | it | o iti | tyat | anu | dāyi | eām | eka | yat | vavne | bhūre | īśāna | pra | etaśam | sūrye | paspdhānam | sauvaśvye | suvim | āvat | indraḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।१५

मन्त्रविषयः-

पुनः सभाध्यक्षविद्युतौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

फिर उक्त सभाध्यक्ष और विद्युद् कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्मै) उक्ताय (इत्) अपि (उ) वितर्के (त्यत्) तम् (अनु) पश्चात् (दायि) दीयते (एषाम्) मनुष्याणां लोकानां वा (एकः) अनुत्तमोऽसहायः (यत्) यम् (वब्ने) याचते (भूरेः) बहुविधस्यैश्वर्यस्य (ईशानः) अधिपतिः (प्र) प्रकृष्टे (एतशम्) अश्वम्। एतशइत्यश्वना०। निघं० १।१४। (सूर्ये) सवितृप्रकाशे (पस्पृधानम्) पुनः पुनः स्पर्द्धमानम् (सौवश्व्ये) शोभना अश्वास्तुरङ्गा विद्यंते यासु सेनासु ते स्वश्वास्तेषां भावे (सुष्विम्) शोभनैश्वर्यप्रदम् (आवत्) रक्षेत् (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षः ॥१५॥

जैसे विद्वानों ने (एषाम्) इन मनुष्यादि प्राणियों को सुख (दायि) दिया हो वैसे जो (एकः) उत्तम से उत्तम सहाय रहित (भूरेः) अनेक प्रकार के ऐश्वर्य्य का (ईशानः) स्वामी (इन्द्रः) सभा आदि का पति (सूर्ये) सूर्य्यमंडल में है वैसे (सौवश्व्ये) उत्तम-२ घोड़े से युक्त सेना में (यत्) जिस (पस्पृधानम्) परस्पर स्पर्द्धा करते हुए (सुष्विम्) उत्तम ऐश्वर्य्य के देनेवाले (एतशम्) घोड़े की (अनुवब्ने) यथा योग्य याचना करता है (त्यत्) उसको (अस्मै) इस (इदु) सभाध्यक्ष ही के लिये (प्रावत्) अच्छे प्रकार रक्षा करता है वह सभा के योग्य होता है ॥१५॥

 

अन्वयः-

यथा विद्वद्भिरेषां सुखं दायि तथा य एको भूरेरीशान् इन्द्रः सूर्येइव यद्यं सौवश्व्ये पस्पृधानं सुष्विमेतशमनुवव्ने याचतेत्यत्तमस्मा इदु सभाद्यध्यक्षाय प्रावेत् स सभामर्हति ॥१५॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यो बहुसुखदाताऽश्वविद्याविदनुपमपुरुषार्थी विद्वान् मनुष्योऽस्ति स एव रक्षेण नियोजनीयः। विद्युद्विद्या च संग्राह्या ॥१५॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जो बहुत सुख देने तथा घोड़ों की विद्या को जानने वाला और उपमा रहित पुरुषार्थी विद्वान् मनुष्य है उसी को प्रजा की रक्षा करने में नियुक्त करें और बिजुली की विद्या का ग्रहण भी अवश्य करें ॥१५॥

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