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Mantra Rig 01.061.014

MANTRA NUMBER:

Mantra 14 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 29 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 35 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्येदु॑ भि॒या गि॒रय॑श्च दृ॒ळ्हा द्यावा॑ च॒ भूमा॑ ज॒नुष॑स्तुजेते उपो॑ वे॒नस्य॒ जोगु॑वान ओ॒णिं स॒द्यो भु॑वद्वी॒र्या॑य नो॒धाः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्येदु भिया गिरयश्च दृळ्हा द्यावा भूमा जनुषस्तुजेते उपो वेनस्य जोगुवान ओणिं सद्यो भुवद्वीर्याय नोधाः

 

The Mantra's transliteration in English

asyed u bhiyā girayaś ca dṛḻhā dyāvā ca bhūmā januas tujete | upo venasya joguvāna oi sadyo bhuvad vīryāya nodhā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्य इत् ऊँ॒ इति॑ भि॒या गि॒रयः॑ च॒ दृ॒ळ्हाः द्यावा॑ च॒ भूमा॑ ज॒नुषः॑ तु॒जे॒ते॒ इति॑ उपो॒ इति॑ वे॒नस्य॑ जोगु॑वानः ओ॒णिम् स॒द्यः भु॒व॒त् वी॒र्या॑य नो॒धाः

 

The Pada Paath - transliteration

asya | it | o iti | bhiyā | giraya | ca | dṛḷ | dyāvā | ca | bhūmā | janua | tujeteiti | upo iti | venasya | joguvāna | oim | sadya | bhuvat | vīryāya | nodhāḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।१४

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, यह विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य (इत्) (उ) पादपूर्णार्थौ (भिया) भयेन (गिरयः) मेघाः। गिरिरिति मेघना०। निघं० १।१०। (च) शत्रूणां समुच्चये (दृढाः) स्थिराः कृताः (द्यावा) द्यौ प्रकाशः। अत्र सुपांसुलुग् इत्याकारादेशः। (च) समुच्चये (भूम) भवेम (जनुषः) जनाः (तुजेते) हिंस्तः (उपो) समीपे (वेनस्य) मेधाविनः। वेनइति मेधाविना०। निघं० ३।१। (जोगुवानः) पुनः पुनरव्यक्तशब्दं कुर्वन् (ओणिम) दुःखान्धकारस्यापनयनम् (सद्यः) शीघ्रम् (भुवत्) भवति (वीर्याय) पराक्रमसंपादनाय (नोधाः) नायकान् प्राप्तिकरान् धरन्तीति। अत्र णीञ्धातोर्बाहुलकादौणादिको डो प्रत्ययस्त दुपपदाड्डुधाञ्धातोश्च क्विप् ॥१४॥

जो (जोगुवानः) अव्यक्त शब्द करने (नोधाः) सेना का नायक सभा आदि का अध्यक्ष (सद्यः) शीघ्र (वीर्य्याय) पराक्रम के सिद्ध करने के लिये (भुवत्) हो जैसे सूर्य से (दृढाः) पुष्ट (गिरयः) मेघ के समान (अस्य) इस (वेनस्य) मेधावी के (इत्) (उ) हो (भिया) भय से (च) शत्रुजन कंपायमान होते हैं जैसे (द्यावा) प्रकाश (च) और भूमि (तुजेते) कांपते हैं वैसे (जनुषः) मनुष्य लोग भय को प्राप्त होते हैं वैसे हम लोग उस सभाध्यक्ष के (उपो) निकट भय को प्राप्त न (भूम) हों और वह सभाध्यक्ष भी (ओणिम्) दुःख को दूरकर सुख को प्राप्त होता है ॥१४॥

 

अन्वयः-

यो जोगुवानो नोधाः सभाध्यक्षः सद्यो वीर्याय भुवद्यथा सूर्याद्दृढा गिरयो मेघाइवाऽस्य वेनस्येदु भिया च शत्रवः कंपन्ते यथा द्यावा च तुजेतेइव जनुषो भयं प्राप्नुवन्ति नोपो भूम स ओणिमाप्नोति ॥१४॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। न किल विद्यादिसद्गुणैरीश्वरेण जगदुत्पादितेन विना सभाद्यध्यक्षादयः प्रजाः पालयितुं यथा सूर्यः सर्वाँल्लोकान् प्रकाशयितुं धर्तुं च शक्नोति तस्माद्विद्याद्युत्तमगुणग्रहणं परशस्तवनं च कार्यम् ॥१४॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यह सबको निश्चय समझना चाहिये कि विद्या आदि उत्तम गुण तथा ईश्वर से जगत् के उत्पन्न होने विना सभाध्यक्ष आदि प्रजा का पालन करने और जैसे सूर्य सब लोकों को प्रकाशित तथा धारण करने को समर्थ नहीं हो सकता। इस लिये विद्या आदि श्रेष्ठगुणों और परमेश्वर ही की प्रशंसा और स्तुति करना उचित है ॥१४॥

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