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Mantra Rig 01.061.012

MANTRA NUMBER:

Mantra 12 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 29 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 33 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- पङ्क्तिः

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्मा इदु॒ प्र भ॑रा॒ तूतु॑जानो वृ॒त्राय॒ वज्र॒मीशा॑नः किये॒धाः गोर्न पर्व॒ वि र॑दा तिर॒श्चेष्य॒न्नर्णां॑स्य॒पां च॒रध्यै॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्मा इदु प्र भरा तूतुजानो वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः गोर्न पर्व वि रदा तिरश्चेष्यन्नर्णांस्यपां चरध्यै

 

The Mantra's transliteration in English

asmā id u pra bharā tūtujāno vtrāya vajram īśāna kiyedhā | gor na parva vi radā tiraśceyann arāsy apā caradhyai 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै इत् ऊँ॒ इति॑ प्र भ॒र॒ तूतु॑जानः वृ॒त्राय॑ वज्र॑म् ईशा॑नः कि॒ये॒धाः गोः पर्व॑ वि र॒द॒ तिर॑श्चा इष्य॑न् अर्णां॑सि अ॒पाम् च॒रध्यै॑

 

The Pada Paath - transliteration

asmai | it | o iti | pra | bhara | tūtujāna | vtrāya | vajram | īśāna | kiyedhā | go | na | parva | vi | rada | tiraścā | iyan | arāsi | apām | caradhyai 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।१२

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्मै) वक्ष्यमाणाय (इत्) अपि (उ) उक्तार्थे (प्र) प्रकृष्टतया (भर) धर (तूतुजानः) त्वरमाणः (वृत्राय) मेघायेव शत्रवे (वज्रम्) शस्त्रसमूहम् (ईशानः) ऐश्वर्यवानैश्वर्यहेतुर्वा (कियेधाः) कियतो गुणान् धरतीति (गोः) वाचः (न) इव (पर्व) अङ्गमङ्गम् (वि) विशेषार्थे (रद) संसेध (तिरश्चा) तिर्यग्गत्या (इष्यन्) जानन् (अर्णांसि) जलानि (अपाम्) जलानाम् (चरध्यै) चरितुं भक्षितुं गन्तुम् ॥१२

हे सभाध्यक्ष (कियेधाः) कितने गुणों को धारण करनेवाला (ईशानः) ऐश्वर्य युक्त (तूतुजानः) शीघ्र करनेहारे आप जैसे सूर्य्य (अपाम्) जलों के सम्बन्ध से (अर्णांसि) जलों के प्रवाहों को (चरध्यै) बहाने के अर्थ (वृत्राय) मेघ के वास्ते वर्त्तना है वैसे (अस्मै) इस शत्रु के वास्ते शस्त्र को (प्र) अच्छे प्रकार (भर) धारण कर (तिरश्चा)
टेढ़ी गति वाले वज्र से (गोर्न) वाणियों के विभाग के समान (पर्व) उसके अंग-२ को काटने को (इष्यन्) इच्छा करता हुआ (इदु) ऐसे ही (विरद) अनेक प्रकार हनन कीजिये ॥
१२

 

अन्वयः-

हे सभाद्यध्यक्ष कियेधा ईशानस्तूतुजानस्त्वं सूर्योऽपामर्णांसि चरध्यै निपातयन् वृत्रायेवास्मै शत्रवे वृत्राय वज्रं प्रभर तिरश्चा वज्रेण गोर्न वाचो विभागमिव तस्य पर्वांगमंगं छेत्तुमिष्यन्निदु विरद विविधतया हिन्धि १२

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे सेनेश ! त्वं यथा प्राणवायुना ताल्वादिषु ताडनं कृत्वा भिन्नान्यक्षराणि पदानि विभज्यन्ते तथैव शत्रोर्बलं छिन्नं-भिन्नं कृत्वांगानि विभक्तानि कृत्वैवं विजयस्व ॥१२

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सेनापते ! आप जैसे प्राण वायु से तालु आदि स्थानों में जीभ का ताड़न कर भिन्न-२ अक्षर वा पदों के विभाग प्रसिद्ध होते हैं वैसे ही सभाध्यक्ष शत्रु के बल को छिन्न-भिन्न और अङ्गों को विभाग युक्त कर के इसी प्रकार शत्रुओं को जीता करे ॥१२

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