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Mantra Rig 01.061.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 28 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 31 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- पङ्क्तिः

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्येदे॒व शव॑सा शु॒षन्तं॒ वि वृ॑श्च॒द्वज्रे॑ण वृ॒त्रमिन्द्र॑: गा व्रा॒णा अ॒वनी॑रमुञ्चद॒भि श्रवो॑ दा॒वने॒ सचे॑ताः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्येदेव शवसा शुषन्तं वि वृश्चद्वज्रेण वृत्रमिन्द्रः गा व्राणा अवनीरमुञ्चदभि श्रवो दावने सचेताः

 

The Mantra's transliteration in English

asyed eva śavasā śuanta vi vścad vajrea vtram indra | gā na vrāā avanīr amuñcad abhi śravo dāvane sacetā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्य इत् ए॒व शव॑सा शु॒षन्तम् वि वृ॒श्च॒त् वज्रे॑ण वृ॒त्रम् इन्द्रः॑ गाः व्रा॒णाः अ॒वनीः॑ अ॒मु॒ञ्च॒त् अ॒भि श्रवः॑ दा॒वने॑ सऽचे॑ताः

 

The Pada Paath - transliteration

asya | it | eva | śavasā | śuantam | vi | vścat | vajrea | vtram | indra | gā | na | vrāā | avanī | amuñcat | abhi | śrava | dāvane | sa-cetāḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।१०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य (इत्) अपि (एव) अवधारणे (शवसा) बलेन (शुषन्तम्) द्वेषेण प्रतापेन क्षीणम् (वि) विविधार्थे (वृश्चत्) छिनत्ति (वज्रेण) शस्त्रसमूहेन तेजोवेगेन वा (वृत्रम्) मेघमिव न्यायावरकं शत्रुं (इन्द्रः) सेनाधिपतिस्तनयित्नुर्वा (गाः) पशून् (न) इव (व्राणाः) आवृताः (अवनीः) पृथिवीं प्रति (अमुंचत्) मुंचति (अभि) आभिमुख्ये (श्रवः) श्रवणमन्नं वा (दावने) दात्रे (सचेताः) समानं चेतो विज्ञानं संज्ञापनं वा यस्य सः ॥१०

जो (सचेताः) तुल्य ज्ञानवान् (इन्द्रः) सेनाधिपति (अस्य) इस सभाध्यक्ष (एव) ही के (शवसा) बल तथा (वज्रेण) तेज से (शुषंतम्) द्वेष से क्षीण हुए (वृत्रम्) प्रकाश के आवरण करनेवाले मेघ के समान आवरण करनेवाले शत्रु को (विवृश्चत्) छेदन करता है वह (गाः) पशुओं को पशुओं के पालन वाले बंधन से छुड़ाकर वन को प्राप्त करते हुए के (न) समान (अवनीः) पृथिवी को (व्राणाः) आवरण किये हुए जल के तुल्य (दावने) देने वाले के लिये (श्रवः) अन्न को (इत्) भी (अभ्यमुंचत्) सब प्रकार से छोड़ता है वह राज्य करने को समर्थ होता है ॥१०

 

अन्वयः-

यः सचेता इन्द्रोऽस्यैव शवसा वज्रेण शुषंतं वृत्रं विवृश्चद्विछिनत्ति स गा न गोपालो बन्धनान्मोचयित्वा वनं गमयतीवावनीः व्राणा दावने श्रव इदपि व्राणा अपो वाभ्यमुंचदाभिमुख्येन मुंचति स राज्यं कर्तुमर्हति १०

 

 

भावार्थः-

अत्र श्लेषोपमालङ्कारः। यथा विद्युत्सहायेन सूर्यः सूर्यस्य सहायेन विद्युच्च प्रवृध्य विश्वं प्रकाश्य मेघं विच्छिद्य भूमौ निपातयति यथा गोपालो बन्धनाद् गा विमुच्य सुखयति तथैव सभासदः सेनासदश्च न्यायं संरक्ष्य शत्रुं# च छिन्नं कृत्वा धार्मिकान् दुःखबन्धनाद्विमोच्य सुखयेत् ॥१०#[हिन्दी भावार्थानुसारेण ‘शत्रूँश्च। सं]

इस मंत्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। जैसे बिजुली के सहाय से सूर्य्य वा सूर्य्य के सहाय से बिजुली बढ़के विश्व को प्रकाशित और मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि में गेर देती है, जैसे गौओं का पालनेवाला गौओं को बंधन से छोड़कर सुखी करता है वैसे ही सभा सेना के अध्यक्ष मनुष्य न्याय की रक्षा और शत्रुओं को छिन्न-भिन्न और धार्मिकों को दुःखरूपी बंधनों से छुड़ाकर सुखी करें ॥१०

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