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Mantra Rig 01.061.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 28 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 30 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्येदे॒व प्र रि॑रिचे महि॒त्वं दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्य॒न्तरि॑क्षात् स्व॒राळिन्द्रो॒ दम॒ वि॒श्वगू॑र्तः स्व॒रिरम॑त्रो ववक्षे॒ रणा॑य

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात् स्वराळिन्द्रो दम विश्वगूर्तः स्वरिरमत्रो ववक्षे रणाय

 

The Mantra's transliteration in English

asyed eva pra ririce mahitva divas pthivyā pary antarikāt | svarā indro dama ā viśvagūrta svarir amatro vavake raāya 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्य इत् ए॒व प्र रि॒रि॒चे॒ म॒हि॒त्वम् दि॒वः पृ॒थि॒व्याः परि॑ अ॒न्तरि॑क्षात् स्व॒ऽराट् इन्द्रः॑ दमे॑ वि॒श्वऽगू॑र्तः सु॒ऽअ॒रिः अम॑त्रः व॒व॒क्षे॒ रणा॑य

 

The Pada Paath - transliteration

asya | it | eva | pra | ririce | mahitvam | diva | pthivyā | pari | antarikāt | sva-rā | indra | dame | ā | viśva-gūrta | su-ari | amatra | vavake | raāya 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।०

मन्त्रविषयः-

अथ सूर्यसभाध्यक्षौ कथं भूतावित्युपदिश्यते।

अब सूर्य सभाध्यक्ष कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्य) सभाध्यक्षस्य सूर्यस्य वा (इत्) अपि (एव) निश्चयार्थे (प्र) प्रकृष्टार्थे (रिरिचे) रिणक्ति अधिकं वर्त्तते (महित्वम्) पूज्यत्वं महागुणविशिष्टत्वं परिमाणेनाधिकत्वं च (दिवः) प्रकाशात् (पृथिव्याः) भूमेः (परि) सर्वतः (अन्तरिक्षात्) सूक्ष्मादाकाशात् (स्वराट्) यः स्वंय राजते सः (इन्द्रः) परमैश्वर्यहेतुमान् हेतुर्वा (दमे) दाम्यंत्युपशाम्यंति जना यस्मिन् गृहे संसारे वा तस्मिन् (आ) आभिमुख्ये (विश्वगूर्त्तः) विश्वं सर्वं भोज्यं वस्तु निगलितं येन सः (स्वरिः) यः शोभनश्चासावरिश्च (अमत्रः) ज्ञानवान् ज्ञानहेतुर्वा (ववक्षे) वक्षति रोषं संघातं करोति (रणाय) सङ्ग्रामाय ॥

जो (विश्वगूर्त्तः) सब भोज्य वस्तुओं को भक्षण करने (स्वरिः) उत्तम शत्रुओं (अमत्रः) ज्ञानवान् वा ज्ञान का हेतु (स्वराट्) अपने आप प्रकाश सहित (इन्द्रः) परमैश्वर्य युक्त सूर्य वा सभाध्यक्ष (दमे) उत्तम घर वा संसार में (रणाय) संग्राम के लिये (आववक्षे) रोष वा अच्छे प्रकार घात करता है वा जिसकी (दिवः) प्रकाश (पृथिव्याः) भूमि और (अन्तरिक्षात्) अन्तिरक्ष से (इत्) भी (परि) सब प्रकार (महित्वम्) पूज्य वा महागुणविशिष्ट महिमा (प्ररिरिचे) विशेष हैं उस (अस्य) इस सूर्य वा सभाध्यक्ष का (एव) ही कार्यों में उपयोग वा सभा आदि में अधिकार देना चाहिये ॥

 

अन्वयः-

यो विश्वगूर्त्तः स्वरिरमत्रः स्वराडिन्द्रो दमे रणायाववक्षे यस्येदपि दिवः पृथिव्या अन्तरिक्षात् परि महित्वं प्ररिरिचेऽस्ति रिक्तं वर्त्तते तस्यास्यैव सभादिष्वधिकारः कार्य्येषूपयोगश्च कर्त्तव्यः

 

 

भावार्थः-

अत्र श्लेषालङ्कारः। मुनुष्यैर्यथा सूर्यः पृथिव्यादिभ्यो गुणैः परिमाणेनाऽधिकोऽस्ति तथैवोत्तमगुणं सभाद्यधिपतिं राजानमधिकृत सर्वकार्य्यसिद्धिः कार्य्या

इस मंत्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सूर्य, पृथिव्यादिकों से गुण वा परिमाण के द्वारा अधिक है; वैसे ही उत्तमगुण युक्त सभा आदि के अधिपति राजा को अधिकार देकर सब कार्यों की सिद्धि करनी चाहिये ॥

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