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Mantra Rig 01.061.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 28 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 29 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्मा इदु॒ ग्नाश्चि॑द्दे॒वप॑त्नी॒रिन्द्रा॑या॒र्कम॑हि॒हत्य॑ ऊवुः परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी ज॑भ्र उ॒र्वी नास्य॒ ते म॑हि॒मानं॒ परि॑ ष्टः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्मा इदु ग्नाश्चिद्देवपत्नीरिन्द्रायार्कमहिहत्य ऊवुः परि द्यावापृथिवी जभ्र उर्वी नास्य ते महिमानं परि ष्टः

 

The Mantra's transliteration in English

asmā id u gnāś cid devapatnīr indrāyārkam ahihatya ūvu | pari dyāvāpthivī jabhra urvī nāsya te mahimānam pari ṣṭa ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै इत् ऊँ॒ इति॑ ग्नाः चि॒त् दे॒वऽप॑त्नीः इन्द्रा॑य अ॒र्कम् अ॒हि॒ऽहत्ये॑ ऊ॒वु॒रित्यू॑वुः परि॑ द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ ज॑भ्रे॒ उ॒र्वी इति॑ अ॒स्य॒ ते इति॑ म॒हि॒मान॑म् परि॑ स्त॒ इति॑ स्तः

 

The Pada Paath - transliteration

asmai | it | o iti | gnā | cit | deva-patnī | indrāya | arkam | ahi-hatye | ūvur ity ūvu | pari | dyāvāpthivī iti | jabhre | urvī iti | na | asya | te iti | mahimānam | pari | staitistaḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्मै) सभाध्यक्षाय (इदु) पादपूर्णे (ग्नाः) वाणीः। ग्नेतिवाङ्ना०। निघं० १।११। (चित्) अपि (देवपत्नीः) देवैर्विद्वद्भिः पालनीयाः (इन्द्राय) परमैश्वर्यप्रापकाय (अर्कम्) दिव्यगुणसम्पन्नमर्चनीयं वीरम् (अहिहत्ये) अहीनां मेघानां हत्या यस्मिंस्तस्मिन् (ऊवुः) तन्तुवद्विस्तारयेयुः (परि) सर्वतः (द्यावापृथिवी) भूमिप्रकाशौ (जभ्रे) धरति (उर्वी) बहुरूपे द्यावापृथिव्यौ। उर्वीति पृथिवीना०। निघं० १।१। (न) निषेधे (अस्य) सूर्यस्य (ते) (महिमानम्) स्तुत्यस्य पूज्यस्य व्यवहारस्य भावम् (परि) अभितः (स्तः) भवतः ॥

हे सभापति ! जैसे यह सूर्य्य (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (जभ्रे) धारण करता वा जिसके वश में (उर्वी) बहुधा रूपप्रकाश युक्त पृथिवी हैं (अस्य) जिस इस सभाध्यक्ष के (अहिहत्ये) मेघों के हनन व्यवहार में (चित्) प्रकाश भूमि की (महिमानम्) महिमा के (न) (परिस्तः) सब प्रकार छेदन को समर्थ नहीं हो सकते वैसे उस (अस्मै) इस (इन्द्राय) ऐश्वर्य प्राप्त करनेवाले सभाध्यक्ष के लिये (इदु) ही (देवपत्नीः) विद्वानों से पालनीय पतिव्रता स्त्रियों के सदृश (ग्नाः) वेदवाणी (अर्कम्) दिव्यगुण सम्पन्न अर्चनीय वीर पुरुष को (पर्यूवुः) सब प्रकार तंतुओं के समान विस्तृत करती हैं वही राज्य करने के योग्य होता है ॥

 

अन्वयः-

हे सभेश ! यथाऽयं द्यावापृथिवी जभ्रेऽस्य वशे उर्वी वर्त्तेते यस्यास्या हिहत्ये द्यावापृथिवीचित् भूमिप्रकाशावपि महिमानं न परिस्तः परिछेत्तुं समर्थेन भवतस्तथा यस्मा अस्मा इन्द्रायेदु देवपत्नी र्ग्ना अर्कं पर्य्यूवुः परितः सर्वतो विस्तारयन्ति स राज्यं कर्तुं योग्यः स्यात्

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यस्य प्रतापमहत्वस्याग्रे पृथिव्यादीनां स्वल्पत्वं विद्यते तथैव पूर्णविद्यावतः पुरुषस्य महिम्नोऽग्रे मूर्खस्य गणना तुच्छाऽस्तीति

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य के प्रताप और महत्त्व के आगे पृथिवी आदि लोकों की गणना स्वल्प है वैसे ही पूर्ण विद्या वाले पुरुष के महिमा के आगे मूर्ख की गणना तुच्छ है ॥

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