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Mantra Rig 01.061.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 28 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 27 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- पङ्क्तिः

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द्वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं१॒॑ रणा॑य वृ॒त्रस्य॑ चिद्वि॒दद्येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं रणाय वृत्रस्य चिद्विदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधाः

 

The Mantra's transliteration in English

asmā id u tvaṣṭā takad vajra svapastama svarya raāya | vtrasya cid vidad yena marma tujann īśānas tujatā kiyedhā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै इत् ऊँ॒ इति॑ त्वष्टा॑ त॒क्ष॒त् वज्र॑म् स्वपः॑ऽतमम् स्व॒र्य॑म् रणा॑य वृ॒त्रस्य॑ चि॒त् वि॒दत् येन॑ मर्म॑ तु॒जन् ईशा॑नः तु॒ज॒ता कि॒ये॒धाः

 

The Pada Paath - transliteration

asmai | it | o | iti | tvaṣṭā | takat | vajram | svapa-tamam | svaryam | raāya | vtrasya | cit | vidat | yena | marma | tujan | īśāna | tujatā | kiyedhāḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्मै) उक्ताय (इत्) एव (उ) वितर्के (त्वष्टा) प्रकाशयिता (तक्षत्) तनूकरोति (वज्रम्) किरणसमूहं प्रहृत्य (स्वपस्तमम्) अतिशयेन शोभनान्यपांसि कर्माणि यस्मात्तम् (स्वर्यम्) स्वः सुखं साधुस्तम् (रणाय) युद्धाय। रणइति संग्रामना०। निघं० २।१। (वृत्रस्य) मेघस्य (चित्) इव (विदत्) प्राप्नुवन् (येन) वज्रेण (मर्म) जीवननिमित्तम् (तुजन्) हिंसन्। अत्र शपो लुक्। (ईशानः) समर्थः (तुजता) छेदकेन वज्रेण (कियेधाः) यः कियतो धरति सः। अत्र पृषोदरा०, इति तस्थान इकारः ॥६॥

मनुष्यों को उचित है कि जो (त्वष्टा) प्रकाश करने (ईशानः) समर्थ (कियेधाः) कितनों को धारण करनेवाला शत्रुओं को (तुजन्) मारता हुआ (वृत्रस्य) मेघ के ऊपर अपने किरणों को छोड़ता (विदत्) प्राप्त होते हुए सूर्य के समान (स्वर्यम्) सुख के हेतु (स्वपस्तमम्) अतिशय करके उत्तम कर्मों के उत्पन्न करनेवाले (वज्रम्) किरणसमूह को (तक्षत्) छेदन करते हुए सूर्य के (चित्) समान (अस्मै) इस (रणाय) सङ्ग्राम के वास्ते जिस (मर्म) जीवन निमित्तस्थान को (तुजता) काटते हुए (येन) जिस वज्र से शत्रुओं को जीतता है (इदु) उसीको सभा आदि का अध्यक्ष करना चाहिये ॥६॥

 

अन्वयः-

मनुष्यैर्यस्त्वष्टेशानः कियेधाः स्वयं शत्रून् तुजन् वृत्रस्य मेघस्योपरि वज्रं स्वकिरणान् क्षिपन् विदत् स्वर्यं स्वपस्तमं तक्षत्सूर्यश्चिदिवास्मै रणाय मर्म तुजता येन वज्रेण शत्रून् विजयते स इदु सभाद्यध्यक्षत्वे योग्य इति वेद्यम् ॥६॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। यथा सविता स्वप्रतापेन मेघं छित्वा भूमौ निपात्य जलं विस्तार्य सुखयति तथा सभाद्यध्यक्षो विद्याविनयादिना शस्त्रास्त्रशिक्षया युद्धेषु कुशलां सेनां संपाद्य शत्रून् जित्वा सर्वान् प्राणिन आनन्दयेत् ॥६॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे सूर्य अपने प्रताप से मेघ को छिन्न भिन्न कर भूमि में जल को गिरा के सबको सुखी करता है वैसे ही सभा आदि का अध्यक्ष विद्या विनय वा शस्त्र अस्त्रों के सीखने सिखाने से युद्धों में कुशल सेना को सिद्ध कर शत्रुओं को जीतकर सब प्राणियों को आनन्दित किया करे ॥६॥

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