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Mantra Rig 01.061.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 27 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 24 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्मा इदु॒ त्यमु॑प॒मं स्व॒र्षां भरा॑म्याङ्गू॒षमा॒स्ये॑न मंहि॑ष्ठ॒मच्छो॑क्तिभिर्मती॒नां सु॑वृ॒क्तिभि॑: सू॒रिं वा॑वृ॒धध्यै॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्मा इदु त्यमुपमं स्वर्षां भराम्याङ्गूषमास्येन मंहिष्ठमच्छोक्तिभिर्मतीनां सुवृक्तिभिः सूरिं वावृधध्यै

 

The Mantra's transliteration in English

asmā id u tyam upama svarām bharāmy āam āsyena | mahiṣṭham acchoktibhir matīnā suvktibhi sūri vāvdhadhyai 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै इत् ऊँ॒ इति॑ त्यम् उ॒प॒ऽमम् स्वः॒ऽसाम् भरा॑मि आ॒ङ्गू॒षम् आ॒स्ये॑न मंहि॑ष्ठम् अच्छो॑क्तिऽभिः म॒ती॒नाम् सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑ सू॒रिम् व॒वृ॒धध्यै॑

 

The Pada Paath - transliteration

asmai | it | o iti | tyam | upa-mam | sva-sām | bharāmi | āam | āsyena | mahiṣṭham | acchokti-bhi | matīnām | suvkti-bhi | sūrim | vavdhadhyai 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।०३

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्मै) सभाध्यक्षाय (इत्) अपि (उ) वितर्के (त्यम्) तम् (उपमम्) दृष्टान्तस्वरूपम् (स्वर्षाम्) सुखप्रापकम् (भरामि) धरामि (आंगूषम्) स्तुतिप्राप्तम् (आस्येन) सुखेन (मंहिष्ठम्) अतिशयेन मंहिता वृद्धस्तम् (अच्छोक्तिभिः) अच्छ श्रेष्ठा उक्तयो वचनानि यासु स्तुतिसु ताभिः (मतीनाम्) मननशीलानां मनुष्याणाम् (सुवृक्तिभिः) सुष्ठु व्रजन्ति गच्छन्ति याभिस्ताभिः (सूरिम्) शास्त्रविदम् (वावृधध्यै) पुनः पुनर्वार्धितुम् ॥३॥

हे मनुष्यो ! जैसे मैं (अस्मै) इस सभाध्यक्ष के लिये (मतीनाम्) मनुष्यों के (वावृधध्यै) अत्यन्त बढ़ाने को (आस्येन) मुख से (सुवृक्तिभिः) जिन में अच्छे प्रकार अधर्म और अविद्या को छोड़ सकें (अच्छोक्तिभिः) श्रेष्ठ वचन स्तुतियों से (इत्) भी (उ) (त्यम्) उसी (उपमम्) उपमा करने योग्य (स्वर्षाम्) सुखों को प्राप्त कराने (आङ्गूषम्) स्तुति को प्राप्त किये हुए (मंहिष्ठम्) अतिशय करके विद्या से वृद्ध (सूरिम्) शास्त्रों को जाननेवाले विद्वान् को (भरामि) धारण करता हूं। वैसे तुम लोग भी किया करो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या ! यथाऽहमस्मा आस्येन मतीनां वावृधध्यै सुवृक्तिभिरच्छोक्तिभिः स्तुतिभिरिदुत्यमुपमं स्वर्षामांगूषं मंहिष्ठं सूरिं भरामि तथैव यूयमपि भरत ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा विद्वद्भिर्मनुष्याणां सुखाय सर्वथोत्कृष्टोऽनुपमो यत्नः क्रियते तथैतेषां सत्काराय मनुष्यैरपि प्रयतितव्यम् ॥३॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वानों से मनुष्यों के लिये सबसे उत्तम उपमा रहित यत्न किया जाता है वैसे इनके सत्कार के वास्ते सब मनुष्य भी प्रयत्न किया करें ॥३॥

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