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Mantra Rig 01.061.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 27 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 23 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्मा इदु॒ प्रय॑ इव॒ प्र यं॑सि॒ भरा॑म्याङ्गू॒षं बाधे॑ सुवृ॒क्ति इन्द्रा॑य हृ॒दा मन॑सा मनी॒षा प्र॒त्नाय॒ पत्ये॒ धियो॑ मर्जयन्त

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्मा इदु प्रय इव प्र यंसि भराम्याङ्गूषं बाधे सुवृक्ति इन्द्राय हृदा मनसा मनीषा प्रत्नाय पत्ये धियो मर्जयन्त

 

The Mantra's transliteration in English

asmā id u praya iva pra yasi bharāmy āam bādhe suvkti | indrāya hdā manasā manīā pratnāya patye dhiyo marjayanta 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै इत् ऊँ॒ इति॑ प्रयः॑ऽइव प्र यं॒सि॒ भरा॑मि आ॒ङ्गू॒षम् बाधे॑ सु॒ऽवृ॒क्ति इन्द्रा॑य हृ॒दा मन॑सा म॒नी॒षा प्र॒त्नाय॑ पत्ये॑ धियः॑ म॒र्ज॒य॒न्त॒

 

The Pada Paath - transliteration

asmai | it | o iti | praya-iva | pra | yasi | bharāmi | āam | bādhe | su-vkti | indrāya | hdā | manasā | manīā | pratnāya | patye | dhiya | marjayanta 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।०२

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्मै) सभाद्यध्यक्षाय (इत्) एव (उ) वितर्के (प्रयइव) यथाप्रीतमन्नम् (प्र) प्रकृष्टार्थे (यंसि) यच्छसि। अत्र शपो लुक्। (भरामि) धरामि पुष्णाभि (आङ्गूषम्) #युद्धं प्राप्तं शत्रुम् (बाधे) ताडयाभि (सुवृक्ति) सुष्ठु व्रजंति येन यानेन तत् (इन्द्राय) शत्रुदुःखविदारकाय (हृदा) आत्मना (मनसा) मननात्मकेन (मनीषा) बुद्ध्या (प्रत्नाय) प्राचीनाय (पत्ये) स्वामिने (धियः) कर्माणि प्रज्ञा वा (मर्जयन्त) शोधयन्ति ॥२॥ #[अत्र ‘युद्धे’ इति पाठः साधीवान्। सं०]

हे विद्वान् मनुष्य ! तुम (अस्मै) इस (प्रत्नाय) प्राचीन सबके मित्र (पत्ये) स्वामी (इन्द्राय) शत्रुओं को विदारण करनेवाले के लिये (प्रयइव) जैसे प्रीतिकारक अन्न वा धन वैसे (प्रयंसि) सुख देते हो जिस परमैश्वर्य युक्त धार्मिक के लिये मैं सब सामग्री अर्थात् (हृदा) हृदय (मनीषा) बुद्धि (मनसा) विज्ञान पूर्वक मन से (सुवृक्ति) उत्तमता से गमन करानेवाले यान को (भरामि) धारण करता वा पुष्ट करता हूं जैसे (आङ्गूषम्) युद्ध में प्राप्त हुए शत्रु को (बाधे) ताड़ना देना जिस वीर के वास्ते सब प्रजा के मनुष्य (धियः) बुद्धि वा कर्म को (मर्जयन्त) शुद्ध करते हैं उस पुरुष के लिये (इत्) ही (उ) तर्क के साथ मैं भी बुद्धि #शुद्ध करूं ॥२॥    #[‘तथा कर्मों को’। सं०।]

 

अन्वयः-

हे विद्वंस्त्वमस्मै प्रत्नाय सुहृदे पत्य इन्द्राय प्रयइव यथा प्रीतमन्नं धनं वा दत्वाऽभिप्रीतमन्नं धनं वा प्रयंसि यस्मा इन्द्रायाहं सर्वाभिः सामग्रीभिर्हृदा मनीषा मनसा सुवृक्ति भराभ्यांगूषं बाधे यस्मै सर्वे वीराः प्रजास्थाश्च मनुष्या धिपो मर्जयन्त शोधयन्ति तस्मा इन्द्रायेद्वहमप्येता मार्जये ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्नैव परीक्षितपूर्वं पूर्णविद्यं धार्मिकं सर्वोपकारकं प्राचीनं सभाद्यधिपतिं विहायैतद्विरुद्धः स्वीकर्त्तव्यः सर्वैस्तस्य प्रियमाचरणीयम् ॥२॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है। मनुष्यों को उचित है कि पहिले परीक्षा किये पूर्ण विद्यायुक्त धार्मिक सबके उपकार करनेवाले प्राचीन पुरुष को सभा का अधिपति करें तथा इससे विरुद्ध मनुष्य को स्वीकार नहीं करें और सब मनुष्य उसके प्रिय आचरण करें ॥२॥

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