Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎sukta 061‎ > ‎

Mantra Rig 01.061.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 61 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 27 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 22 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒स्मा इदु॒ प्र त॒वसे॑ तु॒राय॒ प्रयो॒ ह॑र्मि॒ स्तोमं॒ माहि॑नाय ऋची॑षमा॒याध्रि॑गव॒ ओह॒मिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मा॑णि रा॒तत॑मा

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो हर्मि स्तोमं माहिनाय ऋचीषमायाध्रिगव ओहमिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा

 

The Mantra's transliteration in English

asmā id u pra tavase turāya prayo na harmi stomam māhināya | amāyādhrigava oham indrāya brahmāi rātatamā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै इत् ऊँ॒ इति॑ प्र त॒वसे॑ तु॒राय॑ प्रयः॑ ह॒र्मि॒ स्तोम॑म् माहि॑नाय ऋची॑षमाय अध्रि॑ऽगवे ओह॑म् इन्द्रा॑य ब्रह्मा॑णि रा॒तऽत॑मा

 

The Pada Paath - transliteration

asmai | it | o iti | pra | tavase | turāya | praya | na | harmi | stomam | māhināya | amāya | adhri-gave | oham | indrāya | brahmāi | rāta-tamā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०६१।०१

मन्त्रविषयः-

अथ सभाद्यध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते।

अब इकसठवें १ सूक्त का आरम्भ है। उसके पहिले मन्त्र में सभा आदि का अध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(अस्मै) सभाद्यध्यक्षाय (इत्) एव (उ) वितर्के (प्र) प्रकृष्टे (तवसे) बलवते (तुराय) कार्य्यसिद्धये तूर्णं प्रवर्त्तमानाय शत्रूणां हिंसकाय वा (प्रयः) तृप्तिकारकमन्नम् (न) इव (हर्मि) हरामि। अत्र शपो लुक्। (स्तोमम्) स्तुतिम् (माहिनाय) उत्कृष्टयोगान्महते (ऋचीषमाय) ऋष्यंते स्तूयंते ये त ऋचीषास्तानतिमान्यान् करोति तस्मै। अत्र ऋचधातोर्बाहुलकादौणादिकः कर्मणीषन् प्रत्ययः। ऋचीषमस्तूयत एव ऋचासमः। निरु० ।२३। (अध्रिगवे) शत्रुभिरध्रयोऽसहमाना वीरास्तान् गच्छति प्राप्नोति तस्मै (ओहम्) ओहति प्राप्नोति येन तम्। (इन्द्राय) परमैश्वर्यकारकाय (ब्रह्माणि) सुसंस्कृतानि बृहत्सुखकारकाण्यन्नानि वा। ब्रह्मेत्यन्नना०। निघं० २।७। धनना०। निघं० २।१०। (राततमा) अतिशयेन दातव्यानि ॥१॥

हे विद्वान् लोगो ! जैसे मैं (उ) वितर्कपूर्वक (प्रयः) तृप्ति करनेवाले कर्म्म के (न) समान (तवसे) बलवान् (तुराय) कार्यसिद्धि के लिये शीघ्र करता (ऋचीषमाय) स्तुति करने को प्राप्त होने तथा (अध्रिगवे) शत्रुओं से असह्य वीरों को प्राप्त होने हारे (माहिनाय) उत्तम-२ गुणों से बड़े (अस्मै) इस (इन्द्राय) सभाध्यक्ष के लिये (इत्) ही (ओहम्) प्राप्त करनेवाले (स्तोमम्) स्तुति को (राततमा) अतिशय करने के योग्य (ब्रह्माणि) संस्कार किये हुए अन्न वा धनों को (हर्मि) देता हूं वैसे तुम भी किया करो ॥१॥

 

अन्वयः-

यथाहमु प्रयो न प्रीतिकारकमन्नमिव तवसे तुराय ऋचीषमायाध्रिगवे माहिनायास्मा इन्द्राय सभाद्यध्यक्षायेदेवौहं स्तोमं राततमा ब्रह्माण्यन्नानि वा प्रहर्मि प्रकृष्टतया ददामि तथा यूयमपि कुरुत ॥१॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैः स्तोतुमर्हान् राज्याधिकारिणः कृत्वा तेभ्यो यथायोग्यानि करप्रयुक्तानि धनानि दत्त्वोत्तमैरन्नादिभिः सदा सत्कर्त्तव्याः राजपुरुषैः प्रजास्था मनुष्याश्च ॥१॥

मनुष्यों को चाहिये कि स्तुति के योग्य पुरुषों को राज्य का अधिकार देकर उनके लिये यथायोग्य हाथों से प्रयुक्त किये हुए धनों को देकर उत्तम-२ अन्नादिकों से सदा सत्कार करें और राजपुरुषों को भी चाहिये कि प्रजा के पुरुषों का सत्कार करें ॥१॥

Comments