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Mantra Rig 01.060.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 60 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 26 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 20 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उ॒शिक्पा॑व॒को वसु॒र्मानु॑षेषु॒ वरे॑ण्यो॒ होता॑धायि वि॒क्षु दमू॑ना गृ॒हप॑ति॒र्दम॒ आँ अ॒ग्निर्भु॑वद्रयि॒पती॑ रयी॒णाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उशिक्पावको वसुर्मानुषेषु वरेण्यो होताधायि विक्षु दमूना गृहपतिर्दम आँ अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणाम्

 

The Mantra's transliteration in English

uśik pāvako vasur mānueu vareyo hotādhāyi viku | damūnā ghapatir dama ām̐ agnir bhuvad rayipatī rayīām 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उ॒शिक् पा॒व॒कः वसुः॑ मानु॑षेषु वरे॑ण्यः होता॑ अ॒धा॒यि॒ वि॒क्षु दमू॑ना गृ॒हऽप॑तिः दमे॑ अ॒ग्निः भु॒व॒त् र॒यि॒ऽपतिः॑ र॒यी॒णाम्

 

The Pada Paath - transliteration

uśik | pāvaka | vasu | mānueu | vareya | hotā | adhāyi | viku | damūnā | gha-pati | dame | ā | agni | bhuvat | rayi-pati | rayīām 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।०६०।०४

मन्त्रविषयः

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ।

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

 

पदार्थः

(उशिक्) सत्यं कामयमानः (पावकः) पवित्रः (वसुः) वासयिता (मानुषेषु) युक्त्याहारविहारकर्त्तृषु (वरेण्यः) वरितुं स्वीकर्त्तुमर्हः (होता) सुखानां दाता (अधायि) धीयते (विक्षु) प्रजासु (दमूनाः) दाम्यति येन सः । अत्र दमेरुनसि० (उणा०४.२४०) इत्युनस् प्रत्ययो अन्येषामपि इति दीर्घः । (गृहपतिः) गृहस्य पालयिता (दमे) गृहे (आ) समन्तात् (अग्निः) भौतिकोऽग्निरिव (भुवत्) भवेत् । अयं लेट् प्रयोगः । (रयिपतिः) धनानां पालयिता (रयीणाम्) राज्यादिधनानाम् ॥४॥

मनुष्यों को उचित है कि जो (उशिक्) सत्य की कामनायुक्त (पावकः) अग्नि के तुल्य पवित्र करने (वसुः) वास कराने (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य (दमूनाः) दम अर्थात् शान्तियुक्त (गृहपतिः) गृह का पालन करने तथा (रयिपतिः) धनों को पालने (अग्निः) अग्नि के समान (मानुषेषु) युक्तिपूर्वक आहार-विहार करनेवाले मनुष्य (विक्षु) प्रजा और (दमे) गृह में (रयीणाम्) राज्य आदि धन और होता सुखों का देनेवाला (भुवत्) होवे, वही प्रजा में राजा (अधायि) धारण करने योग्य है ॥४॥

 

अन्वयः

मनुष्यैर्य उशिक् पावको वसुर्वरेण्यो दमूना गृहपती रयिपतिरग्निरिव मानुषेषु विक्षु दमे च रयीणां होता दाता भुवद्भवेत्, स प्रजापालनक्षम अधायि ॥४॥

 

 

भावार्थः

मनुष्यैर्नैव कदाचिदविद्वानधार्मिको राज्यरक्षायामधिकर्त्तव्यः ॥४॥

मनुष्यों को उचित है कि अधर्मी मूर्खजन को राज्य की रक्षा का अधिकार कदापि न देवें ॥४॥







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