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Mantra Rig 01.058.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 58 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 23 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

तपु॑र्जम्भो॒ वन॒ वात॑चोदितो यू॒थे सा॒ह्वाँ अव॑ वाति॒ वंस॑गः अ॒भि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॑सा॒ रज॑: स्था॒तुश्च॒रथं॑ भयते पत॒त्रिण॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

तपुर्जम्भो वन वातचोदितो यूथे साह्वाँ अव वाति वंसगः अभिव्रजन्नक्षितं पाजसा रजः स्थातुश्चरथं भयते पतत्रिणः

 

The Mantra's transliteration in English

tapurjambho vana ā vātacodito yūthe na sāhvām̐ ava vāti vasaga | abhivrajann akitam pājasā raja sthātuś caratham bhayate patatria ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

तपुः॑ऽजम्भः वने॑ वात॑ऽचोदितः यू॒थे सा॒ह्वान् अव॑ वा॒ति॒ वंस॑गः अ॒भि॒ऽव्रज॑न् अक्षि॑तम् पाज॑सा रजः॑ स्था॒तुः च॒रथ॑म् भ॒य॒ते॒ प॒त॒त्रिणः॑

 

The Pada Paath - transliteration

tapu-jambha | vane | ā | vāta-codita | yūthe | na | sāhvān | ava | vāti | vasaga | abhi-vrajan | akitam | pājasā | raja | sthātu | caratham | bhayate | patatri aḥ ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५८।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, यह विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(तपुर्जम्भः) तपूंषि तापा जंभो वक्रमिव यस्य सः (वने) रश्मौ (आ) समन्तात् (वातचोदितः) वायुना प्रेरितः (यूथे) सैन्ये (न) इव (साह्वान्) सहनशीलो वीरः (अत्र) विनिग्रहे (वाति) गच्छति (वंसगः) यो वंसान् संभक्तान् पदार्थान् गच्छति प्राप्नोति सः (अभिव्रजन्) अभितः सर्वतो गच्छन् (अक्षितम्) क्षयरहितम् (पाजसा) बलेन। पाजइति बलना०। निघं० २।। (रजः) सकारणं लोकसमूहम् (स्थातुः) कृतस्थितेः (चरथम्) चर्यते गम्यते भक्ष्यते यस्तम् (भयते) भयं जनयति। अत्र व्यत्ययेन श्लुस्थाने शवादेशः, आत्मने पदञ्च (पतत्रिणः) पक्षिणः ॥५॥

हे मनुष्य लोगो ! जो (वंसगः) भिन्न-२ पदार्थों को प्राप्त होता (वातचोदितः) प्राणों से प्रेरित (तपुर्जम्भः) जिस का मुख के समान प्रताप, वह जीव अग्नि के सदृश जैसे (यूथे) सेना में (साह्वान्) हननशील जीव (आववाति) सब शरीर को चेष्टा कराता है जो विस्तृत होके दुःखों का हनन करता जो (अभिव्रजन्) जाता आता हुआ (चरथम्) चरनेहारे (अक्षितम्) क्षयरहित (रजः) कारण के सहित लोकसमूह को (पाजसा) बल से धरता जो (स्थातुः) स्थिर वृक्ष में बैठे हुए (पतत्रिणः) पक्षी के समान (भयते) भय करता है सो तुम्हारा आत्मस्वरूप है इस प्रकार तुम लोग जानो ॥५॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या ! यो वंसगो वातचोदितस्तपुर्जंभोऽग्निरिव जीवो यूथे साह्वानाववाति विस्तृतो भूत्वा हिनस्ति योऽभिव्रजन् चरथमक्षितं रजः पाजसा धरति स्थातुस्तिष्ठतोवृक्षादेर्मध्ये पतत्रिण इव भयते तद्युष्माकमात्मस्वरूपमस्तीति विजानीत ॥५॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैर्योऽन्तःकरणप्राणेन्द्रियशरीरप्रेरकः सर्वेषामेतेषां धर्त्ता नियन्ताऽधिष्ठातेच्छाद्वेष प्रयत्नसुखदुःखज्ञानादिगुणोऽस्ति सोऽत्र देहे जीवोऽस्तीति वेद्यम् ॥५॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त और, अहङ्कार प्राण अर्थात् प्राणादि दशवायु इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्रादि दश इन्द्रियों का प्रेरक इनका धारण और नियता स्वामी इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आदि गुण वाला है वह इस देह में जीव है ऐसा निश्चित जानो ॥५॥

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