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Mantra Rig 01.058.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 58 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 23 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

क्रा॒णा रु॒द्रेभि॒र्वसु॑भिः पु॒रोहि॑तो॒ होता॒ निष॑त्तो रयि॒षाळम॑र्त्यः रथो॒ वि॒क्ष्वृ॑ञ्जसा॒न आ॒युषु॒ व्या॑नु॒षग्वार्या॑ दे॒व ऋ॑ण्वति

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

क्राणा रुद्रेभिर्वसुभिः पुरोहितो होता निषत्तो रयिषाळमर्त्यः रथो विक्ष्वृञ्जसान आयुषु व्यानुषग्वार्या देव ऋण्वति

 

The Mantra's transliteration in English

krāā rudrebhir vasubhi purohito hotā niatto rayiā amartya | ratho na vikv ñjasāna āyuu vy ānuag vāryā deva ṛṇvati 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

क्रो॒णा रु॒द्रेभिः॑ वसु॑ऽभिः पु॒रःऽहि॑तः होता॑ निऽस॑त्तः र॒यि॒षाट् अम॑र्त्यः रथः॑ वि॒क्षु ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः आ॒युषु॑ वि आ॒नु॒षक् वार्या॑ दे॒वः ऋ॒ण्व॒ति॒

 

The Pada Paath - transliteration

kroā | rudrebhi | vasu-bhi | pura-hita | hotā | ni-satta | rayiā | amatyar | ratha | na | viku | ñjasāna | āyuu | vi | ānuak | vāryā | deva | ṛṇvati 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५८।०३

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(क्राणा) कर्त्ता। अत्र कृञ् धातोर्बाहुलकादौणादिक आनच् प्रत्ययः। सुपांसुलुग् इत्याकारादेशश्च। (रुद्रेभिः) प्राणैः (वसुभिः) पृथिव्यादिभिः सहः (पुरोहितः) पूर्वं ग्रहीता (होता) अत्ता (निसत्तः) स्थितः (रयिषाट) यो रयिं द्रव्यं सहते (अमर्त्यः) नाशरहितः (रथः) रमणीयस्वरूपः (न) इव (विक्षु) प्रजासु (ऋंजसानः) य ऋंजति प्रसाध्नोति सः। अत्र ऋंजिवृधिमदि०। उ० #२।८४। अनेन सानच्प्रत्ययः। (आयुषु) बाल्यावस्थासु (वि) विशिष्टार्थे (आनुषक्) अनुकूलतया (वार्या) वर्त्तुं योग्यानि वस्तूनि (देवः) देदीप्यमानः (ऋण्वति) कर्माणि साध्नोति ॥३॥

हे मनुष्यो ! तुम जो (रुद्रेभिः) प्राणों और (वसुभिः) वास देनेहारे पृथिवी आदि पदार्थों के साथ (निसत्तः) स्थित चलता फिरता (होता) देहादि का धारण करनेहारा (पुरोहितः) प्रथम ग्रहण करने योग्य (रयिषाट्) धन का सहन कर्ता (अमर्त्यः) मरण धर्म रहित (क्राणा) कर्मों का कर्ता (ऋञ्जसानः) जो किये हुए कर्म को प्राप्त होता (विक्षु) प्रजाओं में (रथो न) रथ के समान शरीर सहित होके (आयुषु) बाल्यादि जीवनावस्थाओं में (आनुषक्) अनुकूलता से वर्त्तमान (वार्या) उत्तम पदार्थ और सुखों को (व्यृण्वति) विविध प्रकार सिद्ध करता है वही (देवः) शुद्ध प्रकाशस्वरूप जीवात्मा है ऐसा जानो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या ! यो रुद्रेभिर्वसुभिः सह निषत्तो होता पुरोहितो रयिषाडमर्त्यः क्राणा ऋंजसानो विक्षु रथो नेवायुष्वानुषग्वार्य्या व्यृण्वति साध्नोति स एव देवो जीवात्माऽस्तीति यूयं विजानीत ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। ये पृथिव्यां प्राणैश्चेष्टन्ते मनोऽनुकूलेन रथेनेव शरीरेण सह रमन्ते श्रेष्ठानि वस्तूनि सुखं चेच्छन्ति त एव जीवा इति वेद्यम् ॥३॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जो पृथिवी में प्राणों के साथ चेष्टा मन के साथ अनुकूल रथ के समान शरीर के साथ क्रीड़ा श्रेष्ठ वस्तु और सुख की इच्छा करते हैं वे ही जीव हैं, ऐसा सब लोग जानें ॥३॥

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