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Mantra Rig 01.058.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 58 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 23 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Anuvaak 11 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नोधा गौतमः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

नू चि॑त्सहो॒जा अ॒मृतो॒ नि तु॑न्दते॒ होता॒ यद्दू॒तो अभ॑वद्वि॒वस्व॑तः वि साधि॑ष्ठेभिः प॒थिभी॒ रजो॑ मम॒ दे॒वता॑ता ह॒विषा॑ विवासति

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नू चित्सहोजा अमृतो नि तुन्दते होता यद्दूतो अभवद्विवस्वतः वि साधिष्ठेभिः पथिभी रजो मम देवताता हविषा विवासति

 

The Mantra's transliteration in English

nū cit sahojā amto ni tundate hotā yad dūto abhavad vivasvata | vi sādhiṣṭhebhi pathibhī rajo mama ā devatātā haviā vivāsati 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

नु चि॒त् स॒हः॒ऽजाः अ॒मृतः॑ नि तु॒न्दते॑ होता॑ यत् दू॒तः अभ॑वत् वि॒वस्व॑तः वि साधि॑ष्ठेभिः प॒थिऽभिः॑ रजः॑ म॒मे॒ दे॒वऽता॑ता ह॒विषा॑ वि॒वा॒स॒ति॒

 

The Pada Paath - transliteration

nu | cit | saha-jā | amta | ni | tundate | hotā | yat | dūta | abhavat | vivasvata | vi | sādhiṣṭhebhi | pathi-bhi | raja | mame | ā | deva-tātā | haviā | 

vivāsati 

 

महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५८।०१

मन्त्रविषयः-

अथाग्निदृष्टान्तेन जीवगुणा उपदिश्यन्ते।

अब अट्ठावनवें सूक्त का आरम्भ है। उसके पहिले मंत्र में अग्नि के दृष्टान्त से जीव के गुणों का उपदेश करते हैं।

 

पदार्थः-

(नु) शीघ्रम् (चित्) इव (सहोजाः) यः सहसा बलेन प्रसिद्धः (अमृतः) नाशरहितः (नि) नितराम् (तुन्दते) व्यथते। अत्र वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति नुमागमः। (होता) अत्ता खल्वादाता (यत्) यः (दूतः) उपतप्ता देशान्तरं प्रापयिता (अभवत्) भवति (विवस्वतः) परमेश्वरस्य (वि) विशेषार्थे (साधिष्ठेभिः) अधिष्ठोऽधिष्ठानं समानमधिष्ठानं येषां तैः (पथिभिः) मार्गैः (रजः) पृथिव्यादिलोकसमूहम् (ममे) मिमीते (आ) सर्वतः (देवताता) देवा एव देवतास्तासां भावः (हविषा) आदत्तेन देहेन (विवासति) परिचरति ॥१॥

हे मनुष्यो ! (यत्) जो (चित्) विद्युत् के समान स्वप्रकाश (अमृतः) स्वस्वरूप से नाश रहित (सहोजाः) बल को उत्पादन करनेहारा (होता) कर्म फल का भोक्ता सब मन और शरीर आदि का धर्त्ता (दूतः) सबको चलानेहारा (अभवत्) होता है (देवताता) दिव्यपदार्थों के मध्य में दिव्यस्वरूप (साधिष्ठेभिः) अधिष्ठानों से सह वर्त्तमान (पथिभिः) मार्गों से (रजः) पृथिवी आदि लोकों को (नु) शीघ्र बनानेहारे (विवस्वतः) स्वप्रकाश स्वरूप परमेश्वर के मध्य में वर्त्तमान होकर (हविषा) ग्रहण किये हुए शरीर से सहित (नितुन्दते) निरन्तर जन्म मरण आदि में पीड़ित होता और अपने कर्मों के फलों का (विवासति) सेवन और अपने कर्म में (व्याममे) सब प्रकार से वर्त्तता है सो जीवात्मा है ऐसा तुम लोग जानो ॥१॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या ! यद्यश्चिद्विद्युदिवाऽमृतः सहोजा होता दूतोऽभवद् देवताता साधिष्ठेभिः पथिभी रजो नु निर्मातुर्विवस्वतो मध्ये वर्त्तमानः सन् हविषा सह विवासति स्वकीये कर्मणि व्याममे स जीवात्मा वेदितव्यः ॥१॥

 

 

भावार्थः-

हे मनुष्या ! यूयमनादौ सच्चिदानन्दस्वरूपे सर्वशक्तिमति स्वप्रकाशे सर्वाऽऽधारेऽखिलाविश्वोत्पादके देशकालवस्तुपरिच्छेदशून्ये सर्वाभिव्यापके परमेश्वरे नित्येन #व्यापकसम्बन्धेन योऽनादिर्नित्यश्चेतनोऽल्पोऽल्पज्ञोऽस्ति स एव जीवो वर्त्तत इति बोध्यम् ॥१॥ #[अर्थात् व्याप्य व्यापक सम्बन्धेन। सं०।]

हे मनुष्य लोगो ! तुम अनादि अर्थात् उत्पत्तिरहित, सत्यस्वरूप, ज्ञानमय, आनन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान्, स्वप्रकाश, सबको धारण और सबके उत्पादक, देश काल और वस्तुओं के परिच्छेद् से रहित और सर्वत्र व्यापक परमेश्वर में नित्य व्याप्य *व्यापक सम्बन्ध से जो अनादि नित्य चेतन अल्प एक देशस्थ और अल्पज्ञ है वही जीव है ऐसा निश्चित जानो ॥१॥ *[अर्थात् व्याप्य व्यापक सम्बन्ध से। सं०।]

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