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Mantra Rig 01.057.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 57 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 22 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 71 of Anuvaak 10 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सव्य आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

भूरि॑ इन्द्र वी॒र्यं१॒॑ तव॑ स्मस्य॒स्य स्तो॒तुर्म॑घव॒न्काम॒मा पृ॑ण अनु॑ ते॒ द्यौर्बृ॑ह॒ती वी॒र्यं॑ मम इ॒यं च॑ ते पृथि॒वी ने॑म॒ ओज॑से

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

भूरि इन्द्र वीर्यं तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन्काममा पृण अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं ते पृथिवी नेम ओजसे

 

The Mantra's transliteration in English

bhūri ta indra vīrya tava smasy asya stotur maghavan kāmam ā pṛṇa | anu te dyaur bhatī vīryam mama iya ca te pthivī nema ojase 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

भूरि॑ ते॒ इ॒न्द्र॒ वी॒र्य॑म् तव॑ स्म॒सि॒ अ॒स्य स्तो॒तुः म॒घऽव॒न् काम॑म् पृ॒ण॒ अनु॑ ते॒ द्यौः बृ॒ह॒ती वी॒र्य॑म् म॒मे॒ इ॒यम् च॒ ते॒ पृ॒थि॒वी ने॒मे॒ ओज॑से

 

The Pada Paath - transliteration

bhūri | te | indra | vīryam | tava | smasi | asya | stotu | magha-van | kāmam | ā | pṛṇa | anu | te | dyau | bhatī | vīryam | mame | iyam | ca | te | pthivī | neme | ojase 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।०५७।०५

मन्त्रविषयः

पुनः सः कीदृश इत्युपदिश्यते ।

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

 

पदार्थः

(भूरि) बहु (ते) तव (इन्द्र) परमात्मन् (वीर्य्यम्) बलं पराक्रमो वा (तव) (स्मसि) स्मः (अस्य) वक्ष्यमाणस्य (स्तोतुः) गुणप्रकाशकस्य (मघवन्) परमपूज्य (कामम्) इच्छाम् (आ) समन्तात् (पृण) प्रपूर्द्धि (अनु) पश्चात् (ते) तव (द्यौः) सूर्यादिः (बृहती) महती (वीर्य्यम्) पराक्रमम् (ममे) मिमीते (इयम्) वक्ष्यमाणा (च) समुच्चये (ते) तव (पृथिवी) भूमिः (नेमे) प्रह्वीभूता भवति (ओजसे) बलयुक्ताय ॥५॥

हे (मघवन्) उत्तम धनयुक्त (इन्द्र) सेनादि बलवाले सभाध्यक्ष ! जिस (ते) आप का जो (भूरि) बहुत (वीर्यम्) पराक्रम है, जिस के हम लोग (स्मसि) आश्रित और जिस (तव) आपकी (इयम्) यह (बृहती) बड़ी (द्यौः) विद्या, विनययुक्त न्यायप्रकाश और राज्य के वास्ते (पृथिवी) भूमि (ओजसे) बलयुक्त के लिये और भोगने के लिये (नेमे) नम्र के समान है, वह आप (अस्य) इस (स्तोतुः) स्तुतिकर्त्ता के (कामम्) कामना को (आपृण) परिपूर्ण करें ॥५॥

 

अन्वयः

हे मघवन्निन्द्र ! यस्य ते तव यद्भूरि वीर्य्यमस्ति यद्वयं स्मसि यस्य तवेयं बृहती द्यौः पृथिवी चौजसे नेमे भोगाय प्रह्वीभूता नम्रेव भवति, स त्वमस्य स्तोतुः काममापृण ॥५॥

 

 

भावार्थः

मनुष्यैरीश्वरस्यानन्तं वीर्य्यमाश्रित्य कामसिद्धिं पृथिवीराज्यं सम्पाद्य सततं सुखयितव्यम् ॥५॥

मनुष्यों को योग्य है कि ईश्वर का आश्रय करके सब कामनाओं की सिद्धि वा पृथिवी के राज्य की प्राप्ति करके निरन्तर सुखी रहें ॥५॥







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