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Mantra Rig 01.055.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 55 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 19 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 55 of Anuvaak 10 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सव्य आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराड्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं॒ भोज॑से म॒हो नृ॒म्णस्य॒ धर्म॑णामिरज्यसि प्र वी॒र्ये॑ण दे॒वताति॑ चेकिते॒ विश्व॑स्मा उ॒ग्रः कर्म॑णे पु॒रोहि॑तः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वं तमिन्द्र पर्वतं भोजसे महो नृम्णस्य धर्मणामिरज्यसि प्र वीर्येण देवताति चेकिते विश्वस्मा उग्रः कर्मणे पुरोहितः

 

The Mantra's transliteration in English

tva tam indra parvata na bhojase maho nmasya dharmaām irajyasi | pra vīryea devatāti cekite viśvasmā ugra karmae purohita 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वम् तम् इ॒न्द्र॒ पर्व॑तम् भोज॑से म॒हः नृ॒म्णस्य॑ धर्म॑णाम् इ॒र॒ज्य॒सि॒ प्र वी॒र्ये॑ण दे॒वताति॑ चे॒कि॒ते॒ विश्व॑स्मै उ॒ग्रः कर्म॑णे पु॒रःऽहि॑तः

 

The Pada Paath - transliteration

tvam | tam | indra | parvatam | na | bhojase | maha | nmasya | dharmaām | irajyasi | pra | vīryea | devatāti | cekite | viśvasmai | ugra | karmae | pura-h itaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५५।०३

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृशइत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्वम्) (तम्) वक्ष्यमाणम् (इन्द्र) सभाध्यक्ष (पर्वतम्) मेघम् (न) व (भोजसे) पालनाय भोगाय वा (महः) महागुणविशिष्टस्य (नृम्णस्य) धनस्य। नृम्णमिति घनना०। निघं० २।१०। (धर्मणाम्) धर्माणां योगेन (इरज्यसि) ऐश्वर्यं प्राप्नोसि। इरज्यतीत्यैश्वर्य्यकर्मसु पठितम्। निघं० २।२१। (प्र) प्रकृष्टार्थे (वीर्येण) पराक्रमेण (देवता) द्योतमानएव (अति) अतिशये (चेकिते) जानाति। वा छन्दसिस०। इत्यभ्यासस्य गुणः (विश्वस्मै) सर्वस्मै (उग्रः) तीव्रकारी (कर्मणे) कर्त्तव्याय (पुरोहितः) पुरोहितवदुपकारी ॥३॥

हे (इन्द्र) सभाद्यध्यक्ष ! जो (देवता) विद्वान् (उग्रः) तीव्रकारी (पुरोहितः) पुरोहित के समान उपकार करनेवाले (त्वम्) आप जैसे बिजुली (पर्वतम्) मेघ के आश्रय करनेवाले बद्दलों के (न) समान (वीर्येण) पराक्रम से (भोजसे) पालन वा भोग के लिये (तम्) उस शत्रु को हनन कर (महः) बड़े (नृम्णस्य) धन और (धर्मणाम्) धर्मों के योग से (अतीरज्यसि) अतिशय ऐश्वर्य करते हो जो आप (विश्वस्मै) सब (कर्मणे) कर्मों के लिये (प्रचेकिते) जानते हो वह आप हम लोगों में राजा हूजिये ॥३॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र ! यो देवतोग्रः पुरोहितस्त्वं विद्युद्वत्पर्वतं न वीर्य्येण भोजसे तं शत्रुं हत्वा महो नृम्णस्य धर्मणां योगेनातीरज्यसि यो भवान् विश्वस्मै कर्मणे प्रचेकिते सोऽस्मासु राजा भवतु ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। ये मनुष्याः प्रवृत्तिमाश्रित्य धनं संपाद्य भोगान्प्राप्नुवन्ति ते ससभाध्यक्षा विद्याबुद्धिविनयधर्मवीरसेनाः प्राप्य दुष्टेषूग्रा धार्मिकेषु क्षमान्विताः सर्वेषां हितकारका भवन्ति ॥३॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रवृत्ति का आश्रय और धन को संपादन करके भोगों को प्राप्त करते है वे सभाध्यक्ष के सहित विद्या, बुद्धि, विनय और धर्मयुक्त वीर पुरुषों की सेना को प्राप्त होकर दुष्ट जनों के विषय तेजधारी और धर्मात्माओं में क्षमायुक्त हों वे ही सबके हितकारक होते हैं ॥३॥

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