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Mantra Rig 01.055.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 55 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 19 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 54 of Anuvaak 10 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सव्य आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृज्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

सो अ॑र्ण॒वो न॒द्य॑: समु॒द्रिय॒: प्रति॑ गृभ्णाति॒ विश्रि॑ता॒ वरी॑मभिः इन्द्र॒: सोम॑स्य पी॒तये॑ वृषायते स॒नात्स यु॒ध्म ओज॑सा पनस्यते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

सो अर्णवो नद्यः समुद्रियः प्रति गृभ्णाति विश्रिता वरीमभिः इन्द्रः सोमस्य पीतये वृषायते सनात्स युध्म ओजसा पनस्यते

 

The Mantra's transliteration in English

so aravo na nadya samudriya prati gbhāti viśritā varīmabhi | indra somasya pītaye vṛṣāyate sanāt sa yudhma ojasā panasyate 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः अ॒र्ण॒वः न॒द्यः॑ स॒मु॒द्रियः॑ प्रति॑ गृ॒भ्णा॒ति॒ विऽश्रि॑ताः वरी॑मऽभिः इन्द्रः॑ सोम॑स्य पी॒तये॑ वृ॒ष॒ऽय॒ते॒ स॒नात् सः यु॒ध्मः ओज॑सा प॒न॒स्य॒ते॒

 

The Pada Paath - transliteration

sa | arava | na | nadya | samudriya | prati | gbhāti | vi-śritā | varīma-bhi | indra | somasya | pītaye | vṛṣa-yate | sanāt | sa | yudhma | ojasā | panasyate 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५५।०२

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृग्गुण इत्युपदिश्यते।

फिर यह कैसे गुणवाला हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(सः) उक्तार्थः (अर्णवः) समुद्रः (न) इव (नद्यः) सरितः (समुद्रियः) समुद्रे भयो नौसमूहः (प्रति) क्रियायोगे (गृभ्णाति) गृह्णाति (विश्रिताः) विविधप्रकारैः सेवमानाः (वरीमभिः) वृण्वन्ति ये तैः शिल्पिभिः (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षः (सोमस्य) वैद्यविद्यासंपादितस्य (पीतये) पानाय (वृषायते) वृषइवाचरति (सनात्) सर्वदा (सः) (युष्मः) यो युध्यते सः (ओजसा) बलेन (पनस्यते) यः पनायति व्यवहरति स पना, इंपनावाचरति ॥२॥

जो (इन्द्रः) सभाध्यक्ष सूर्य के समान (सोमस्य) वैद्यक विद्या से सम्पादित वा स्वभाव से उत्पन्न हुए रस के (पीतये) पीने के लिये (वृषायते) बैल के समान आचरण करता है (सः) वह (युष्मः) युद्ध करनेवाला पुरुष (न) जैसे (विश्रिताः) नाना प्रकार के देशों का सेवन करने हारी (नद्यः) नदियाँ (अर्णवः) समुद्र को प्राप्त होके स्थिर होती और जैसे (समुद्रियः) सागरों में चलने योग्य नौकादि यान समूह पार पहुंचाता हैं जैसे (सनात्) निरन्तर (ओजसा) बल से (वरीमभिः) धर्म वा शिल्पी क्रिया से (पनस्यते) व्यवहार करनेवाले के समान आचरण और पृथिवी आदि के राज्य को (प्रतिगृभ्णाति) ग्रहण कर सकता है वह राज्य करने और सत्कार के योग्य है उसको सब मनुष्य स्वीकार करें ॥२॥

 

अन्वयः-

य इन्द्रः सूर्यइव सोमस्य पीतये वृषायते सयुध्मो विश्रिता नद्योऽर्णवो न समुद्रियः सनादोजसा वरीमभिः पनस्यते राज्यं प्रति गृभ्णाति स राज्याय सत्काराय च सर्वैर्मनुष्यैः स्वीकार्य्यः ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सागरो विविधानि रत्नानि नानानदींश्च स्वमहिम्ना स्वस्मिन् संरक्षति तथैव सभाद्यध्यक्षो विविधान् पदार्थान्नानाविधाः सेनाः स्वीकृत्य दुष्टान् पराजित्य श्रेष्ठान् संरक्ष्य स्वमहिमानं विस्तारयेत् ॥२॥

इस मंत्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। जैसे समुद्र नाना प्रकार के रत्न और नाना प्रकार की नदियों को अपनी महिमा से अपने में रक्षा करता है वैसे ही सभाध्यक्ष आदि भी अनेक प्रकार के पदार्थ और अनेक प्रकार की सेनाओं को स्वीकार कर दुष्टों को जीत और श्रेष्ठों की रक्षा करके अपनी महिमा फैलावें ॥२॥

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