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Mantra Rig 01.055.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 55 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 19 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 53 of Anuvaak 10 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सव्य आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

दि॒वश्चि॑दस्य वरि॒मा वि प॑प्रथ॒ इन्द्रं॒ म॒ह्ना पृ॑थि॒वी च॒न प्रति॑ भी॒मस्तुवि॑ष्माञ्चर्ष॒णिभ्य॑ आत॒पः शिशी॑ते॒ वज्रं॒ तेज॑से॒ वंस॑गः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

दिवश्चिदस्य वरिमा वि पप्रथ इन्द्रं मह्ना पृथिवी चन प्रति भीमस्तुविष्माञ्चर्षणिभ्य आतपः शिशीते वज्रं तेजसे वंसगः

 

The Mantra's transliteration in English

divaś cid asya varimā vi papratha indra na mahnā pthivī cana prati | bhīmas tuvimāñ caraibhya ātapa śiśīte vajra tejase na vasaga 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

दि॒वः चि॒त् अ॒स्य॒ व॒रि॒मा वि प॒प्र॒थ॒ इन्द्र॑म् म॒ह्ना पृ॒थि॒वी च॒न प्रति॑ भी॒मः तुवि॑ष्मान् च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑ आ॒ऽत॒पः शिशी॑ते वज्र॑म् तेज॑से वंस॑गः

 

The Pada Paath - transliteration

diva | cit | asya | varimā | vi | papratha | indram | na | mahnā | pthivī | cana | prati | bhīma | tuvimān | carai-bhya | ātapa | śiśīte | vajram | tejase | na | vasagaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५५।०१

मन्त्रविषयः-

तत्रादौ सभाध्यक्षगुणा उपदिश्यन्ते।

अब पचपनवें सूक्त के पहिले मंत्र में सभाध्यक्ष के गुणों का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(दिवः) दिव्यगुणात् (चित्) एव (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य (वरिमा) वरस्य भावः (वि) विविधार्थे (पप्रथे) प्रथते (इन्द्रम्) परमैश्वर्यस्य प्रापकम् (न) इव (मन्हा) महत्त्वेन। अत्र महधातोः बाहुलकाद् औणादिकः कनिन् प्रत्ययः। (पृथिवी) भूमिः (चन) अपि (प्रति) योगे (भीमः) दुष्टान् प्रति भयंकरः श्रेष्ठान्प्रति सुखकरः (तुविष्मान्) वृद्धिमान्। अत्र तुधातोः बाहुलकादौणादिक इसिः प्रत्ययः स च कित्। (चर्षणिभ्यः) दुष्टेभ्यः श्रेष्ठेभ्यो वा मनुष्येभ्यः (आतपः) समंतात् प्रतापयुक्तः (शिशीते) उदके #शिशीतमित्युदकना०। निघं० १।१२। (वज्रम्) किरणान् (तेजसे) प्रकाशाय (न) इव (वंसगः) यो वंसं सम्भजनीयं गच्छति गमयति वा स वृषभः ॥१॥ #[शिशीत इति पदनामसु वर्तते। सं]

हे मनुष्यो ! जैसे (अस्य) इस वीरता के (दिवः) प्रकाश से (वरिमा) उत्तमता का भाव (मन्हा) बड़ाई से (विपप्रथे) विशेष करके प्रसिद्ध करता है (पृथिवी) जिसके बराबर भूमि (चन) भी तुल्य (न) नहीं और न (आतपः) सब प्रकार प्रताप युक्त (वंसगः) बलवान् विभाग कर्ता के समान (पृथिवी) भूमि के (प्रति) मध्य में (तेजसे) प्रकाशार्थ (वज्रम्) किरणों को (शिशीते) अति शीतल उदक में प्रक्षेप करता है वैसे जो दुष्टों के लिये भयंकर धर्मात्माओं के वास्ते सुखदाता होके प्रजाओं का पालन करे वह सबसे सत्कार के योग्य है, अन्य नहीं ॥१॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या ! यथाऽस्य सवितुर्दिवो वरिमा मन्हा विपप्रथे पृथिवी चन मन्हा तुल्या न भवति नातपो वंसगो न गोसमूहान्वंसगो न पृथिवीं प्रति तेजसे वज्रं शिशीते प्रक्षिपति तथा यो दुष्टेभ्यो भीमो धार्मिकेभ्यः प्रियो भुत्वा प्रजाः पालयेत्स चित्सर्वैः सत्कर्त्तव्यो नेतरः खलु ॥१॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सवितृमण्डलं सर्वेभ्यो लोकेभ्य उत्कृष्टगुणं महद्वर्त्तेते यथा वृषभो गोसमूहेषूत्तमो महाबलिष्ठो वर्त्तते तथैवोत्कृष्ठगुणो महान्मनुष्यः सभाद्यधिपतिः कार्य्यः। स च सदैव स्वयं धर्मात्मा सन् दुष्टेभ्यो भयप्रदो धार्मिकेभ्यः सुखकारी च भवेत् ॥१॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्यमण्डल सब लोकों से उत्कृष्ट गुणयुक्त और बड़ा है और जैसे बैल गोसमूहों में उत्तम और महाबलवान् होता है वैसे ही उत्कृष्ट गुणयुक्त सबसे बड़े मनुष्य को सब मनुष्यों को सभा आदि का पति करना चाहिये और वे सभाध्यक्षादि दुष्टों को भय देने और धार्मिकों के लिये आप भी धर्मात्मा होके सुख देनेवाले सदा होवें ॥१॥

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