Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎sukta 054‎ > ‎

Mantra Rig 01.054.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 54 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 17 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 45 of Anuvaak 10 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सव्य आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराड्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वं दि॒वो बृ॑ह॒तः सानु॑ कोप॒योऽव॒ त्मना॑ धृष॒ता शम्ब॑रं भिनत् यन्मा॒यिनो॑ व्र॒न्दिनो॑ म॒न्दिना॑ धृ॒षच्छि॒तां गभ॑स्तिम॒शनिं॑ पृत॒न्यसि॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वं दिवो बृहतः सानु कोपयोऽव त्मना धृषता शम्बरं भिनत् यन्मायिनो व्रन्दिनो मन्दिना धृषच्छितां गभस्तिमशनिं पृतन्यसि

 

The Mantra's transliteration in English

tva divo bhata sānu kopayo 'va tmanā dhṛṣatā śambaram bhinat | yan māyino vrandino mandinā dhṛṣac chitā gabhastim aśanim ptanyasi 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वम् दि॒वः बृ॒ह॒तः सानु॑ को॒प॒यः॒ अव॑ त्मना॑ धृ॒ष॒ता शम्ब॑रम् भि॒न॒त् यत् मा॒यिनः॑ व्र॒न्दिनः॑ म॒न्दिना॑ धृ॒षत् शि॒ताम् गभ॑स्तिम् अ॒शनि॑म् पृ॒त॒न्यसि॑

 

The Pada Paath - transliteration

tvam | diva | bhata | sānu | kopaya | ava | tmanā | dhṛṣatā | śambaram | bhinat | yat | māyina | vrandina | mandinā | dhṛṣat | śitām | gabhastim | aśanim | ptanyasi 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५४।०४

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह सभाध्यक्ष कैसा होवे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्वम्) सभाध्यक्षः (दिवः) प्रकाशमयान्नयायात् (बृहतः) महतः सत्यशुभगुणयुक्तात् (सानु) सनंति संभजन्ति येन कर्मणा तत्। अत्र दृसनिजनि०। उ० १।३। इति ञुण् प्रत्ययः। (कोपयः) कोपयसि (अव) निरोधे (त्मना) आत्मना (धृषता) दृढकर्मकारिणा (शम्बरम्) शं सुखं वृणोति येन तं मेघमिव शत्रुम् (भिनत्) विदृणाति (यत्) यः (मायिनः) कपटादिदोषयुक्ताँश्छत्रून् (ब्रन्दिनः) निंदिता ब्रन्दा मनुष्यादिसमूहा विद्यन्ते येषां तान् (मन्दिना) हर्षकारेण बलिना (धृषत्) शत्रुघर्षणं कुर्वन् (शिताम्) तीक्ष्णधाराम् (गभस्तिम्) रश्मिम् (अशनिम्) छेदनभेदनेन वज्रस्वरूपाम् (पृतन्यसि) आत्मनः पृतनां सेनामिच्छसि ॥४॥

हे सभाध्यक्ष जो (धृषत्) शत्रुओं का धर्षण करता (त्वम्) आप जैसे सूर्य्य (बृहतः) महासत्य शुभगुणयुक्त (दिवः) प्रकाश से (सानु) सेवने योग्य मेघ के शिखरों पर (शिताम्) अतितीक्ष्ण (अशनिम्) छेदन भेदन करने से वज्रस्वरूप बिजुली और (गभस्तिम्) वज्ररूप किरणों का प्रहार कर (शम्बरम्) मेघ को (भिनत्) काट के भूमि में गिरा देता है वैसे शस्त्र और अस्त्रों को चलाके अपने (त्मना) आत्मा से दुष्ट मनुष्यों को (अवकोषयः) कोष कराते (ब्रन्दिनः) निंदित मनुष्यादि समूहों वाले (मायिनः) कपटादि दोष युक्त शत्रुओं को विदीर्ण करते और उनके निवारण के लिये (पृतन्यसि) अपने न्यायादि गुणों की प्रकाश करनेवाली विद्या वा वीर पुरुषों से युक्त सेना की इच्छा करते हो सो आप राज्य के योग्य होते हो ॥४॥

 

अन्वयः-

हे सभाध्यक्ष ! यः शत्रून् धृषत्त्वं यथा सूर्य्यो बृहतो दिवः सानु शितामशनिं गभस्तिं वज्राख्यं किरणं प्रहृत्य शंबरं मेघं भिनत्तथा शस्त्रास्त्राणि प्रक्षिप्य त्मना दुष्टजनानवकोपयो ब्रन्दिनो मायिनो विदृणासि तन्निवारणाय पृतन्यासि स त्वं राज्यमर्हसि ॥४॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा जगदीश्वरः पापकर्मकारिभ्यः स्वस्वपापानुसारेण दुःखफलानि दत्वा यथायोग्यं पीडयत्येवं सभाध्यक्षः शस्त्रास्त्रशिक्षया धार्मिकशूरवीरसेनां संपाद्य दुष्टकर्मकारिणो निवार्य्य धार्मिकीं प्रजां सततं पालयेत् ॥४॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर पापकर्म करनेवाले मनुष्यों के लिये अपने-२ पाप के अनुसार दुःख के फलों को देकर यथायोग्य पीड़ा देता है इसी प्रकार सभाध्यक्ष को चाहिये कि शस्त्रों और अस्त्रों की शिक्षा से धार्मिक शूर वीर पुरुषों की सेना को सिद्ध और दुष्ट कर्म करनेवाले मनुष्यों का निवारण करके धर्मयुक्त प्रजा का निरन्तर पालन करे ॥४॥

Comments