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Mantra Rig 01.052.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 52 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 13 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 21 of Anuvaak 10 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सव्य आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराड्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

परीं॑ घृ॒णा च॑रति तित्वि॒षे शवो॒ऽपो वृ॒त्वी रज॑सो बु॒ध्नमाश॑यत् वृ॒त्रस्य॒ यत्प्र॑व॒णे दु॒र्गृभि॑श्वनो निज॒घन्थ॒ हन्वो॑रिन्द्र तन्य॒तुम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

परीं घृणा चरति तित्विषे शवोऽपो वृत्वी रजसो बुध्नमाशयत् वृत्रस्य यत्प्रवणे दुर्गृभिश्वनो निजघन्थ हन्वोरिन्द्र तन्यतुम्

 

The Mantra's transliteration in English

parī ghṛṇā carati titvie śavo 'po vtvī rajaso budhnam āśayat | vtrasya yat pravae durgbhiśvano nijaghantha hanvor indra tanyatum 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

परि॑ ई॒म् घृ॒णा च॒र॒ति॒ ति॒त्वि॒षे शवः॑ अ॒पः वृ॒त्वी रज॑सः बु॒ध्नम् अ॒श॒य॒त् वृ॒त्रस्य॑ यत् प्र॒व॒णे दुः॒ऽगृभि॑श्वनः नि॒ऽज॒घन्थ॑ हन्वोः॑ इ॒न्द्र॒ त॒न्य॒तुम्

 

The Pada Paath - transliteration

pari | īm | ghṛṇā | carati | titvie | śava | apa | vtvī | rajasa | budhnam | ā | aśayat | vtrasya | yat | pravae | du-gbhiśvana | ni-jaghantha | hanvo | indra | tanyatum 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati   

०१।०५२।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स किंवत्किं करोतीत्युपदिश्यते।

फिर वह सभाध्यक्ष किसके तुल्य क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(परि) सर्वतः (ईम्) उदकम्। ईमित्युदकना०। निघं० १।१२। (घृणा) दीप्तिः क्षरणं वा (चरति) सेवते (तित्विषे) प्रकाशाय (शवः) बलम् (अपः) जलानि (वृत्वी) आवृत्य (रजसः) अन्तरिक्षस्य मध्ये (बुध्नम्) शरीरम्। वेदमपीतरबुध्नमेतस्मादेव बद्धा अस्मिन् धृताः प्राणा इति। निरु० १०।४४। (आ) समंतात् (अशयत्) शेते (वृत्रस्य) मेघस्य (यम्) यस्य (प्रवणे) गमने (दुर्गृभिश्वनः) दुःखेन गृभिर्गृहिर्ग्रहणं श्वाऽभिव्याप्तिर्यस्य तस्य। अत्र गृहधातोः #इक्कृषादिभ्यइतक् हस्य भत्वं च। अशूङ्व्याप्तावित्यस्मात्कनिन्प्रत्ययो युगागमोऽकारलोपश्च। (निजघंथ) नितरां हन्ति (हन्वोः) सुखावयवयोरिव (इन्द्र) सवितृवद्वर्त्तमान (तन्यतुम्) विद्युतम् ॥६॥ #[वा० अ० ३।३।१०८]

हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान सभाध्यक्ष जैसे (तित्विषे) प्रकाश के लिये (यत्) जिस सूर्य का (शवः) बल वा (धृणा) दीप्ति (ईम्) जल को (परिचरति) सेवन करती है जो (दुर्गृभिश्वनः) दुःख से जिसका ग्रहण हो (वृत्रस्य) मेघ का (बुध्नम्) शरीर (रजसः) अन्तरिक्ष के मध्य में (आपः)॥ जल को (वृत्वी) आवरण करके (अशयत्) सोता है उसके (हन्वोः) आगे पीछे के मुख के अवयवों में (तन्यतुम्) बिजली को छोड़कर उसे (प्रवणे) नीचे (निजघंथ) मारकर गेर देता है वैसे वर्त्तमान होकर न्याय में प्रवृत्त हूजिये ॥६॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र ! यथा तित्विषे यस्येन्द्रस्य सूर्यस्य शवो बलं धृणा दीप्तिरीमुदकं परिचरति यो यस्य दुगृभिश्वनो वृत्रस्य मेघस्य बुध्नं शरीरं रजसोन्तरिक्षस्य मध्येऽपो वृत्वी जलमावृत्याशयच्छेते तस्य हन्वोरग्रपार्श्वभागयोरुपरि तन्यतुं विद्युतं प्रहृत्य प्रवणे निजघंथ तथा वर्त्तमानः सन्न्याये प्रवर्त्तस्व ॥६॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्याणामियं योग्यतास्ति यत्सूर्यमेघवद्वर्त्तित्वा विद्यान्यायवर्षा प्रकाशी कार्य्येति ॥६॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जो सूर्य वा मेघ के समान वर्त्तके विद्या और न्याय की वर्षा का प्रकाश करें ॥६॥

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