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Mantra Rig 01.052.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 52 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 12 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 20 of Anuvaak 10 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सव्य आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒भि स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑तो र॒घ्वीरि॑व प्रव॒णे स॑स्रुरू॒तय॑: इन्द्रो॒ यद्व॒ज्री धृ॒षमा॑णो॒ अन्ध॑सा भि॒नद्व॒लस्य॑ परि॒धीँरि॑व त्रि॒तः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अभि स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यतो रघ्वीरिव प्रवणे सस्रुरूतयः इन्द्रो यद्वज्री धृषमाणो अन्धसा भिनद्वलस्य परिधीँरिव त्रितः

 

The Mantra's transliteration in English

abhi svavṛṣṭim made asya yudhyato raghvīr iva pravae sasrur ūtaya | indro yad vajrī dhṛṣamāo andhasā bhinad valasya paridhīm̐r iva trita 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒भि स्वऽवृ॑ष्टिम् मदे॑ अ॒स्य॒ युध्य॑तः र॒घ्वीःऽइ॑व प्र॒व॒णे स॒स्रुः॒ ऊ॒तयः॑ इन्द्रः॑ यत् व॒ज्री धृ॒षमा॑णः॑ अन्ध॑सा भि॒नत् व॒लस्य॑ प॒रि॒धीन्ऽइ॑व त्रि॒तः

 

The Pada Paath - transliteration

abhi | sva-vṛṣtim | made | asya | yudhyata | raghvī-iva | pravae | sasru | ūtaya | indra | yat | vajrī | dhṛṣamāa | andhasā | bhinat | valasya | paridhīn-iva | tritaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati   

०१।०५२।०५

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अभि) आभिमुख्ये (स्ववृष्टिम्) स्वस्य शस्त्राणां वा वृष्टिर्यस्य तम् (मदे) हर्षे (अस्य) शत्रोर्वृत्रस्य वा (युध्यतः) युद्धं कुर्वतः (रध्वीरिव) यथा गमनशीला नद्यः (प्रवणे) निम्नस्थाने (सस्रुः) गच्छन्ति (ऊतयः) रक्षणाद्याः (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षो विद्युद्वा (यत्) यः (वज्री) प्रशस्तो वज्रः शत्रुच्छेदकः शस्त्रसमूहो विद्यते यस्य सः (धृषमाणः) शत्रूणां धर्षणाकर्षणे प्रगल्भः (अन्धसा) अन्नादिनोदनादिना वा (भिनत्) भिनत्ति (बलस्य) बलवतः शत्रोर्मेघस्य वा। बल इति मेघना० निघं० १।१०। (परिधींरिव) सर्वत उपरिस्था गोलरेखेव (त्रितः) उपरिरेखातो मध्यरेखातस्तिर्यग्रेखातश्च ॥५॥

(यत्) जो सूर्य्य के समान (स्ववृष्टिम्) अपने शस्त्रों की वृष्टि करता हुआ (धृषमाणः) शत्रुओं को प्रगल्भता दिखाने हारा (वज्री) शत्रुओं को छेदन करनेवाले शस्त्रसमूह से युक्त (इन्द्रः) सभाध्यक्ष (मदे) हर्ष में (अस्य) इस (युध्यतः) युद्ध करते हुए (बलस्य) शत्रु के (त्रितः) ऊपर, मध्य और टेढ़ी तीन रेखाओं से (परिधींरिव) सब प्रकार ऊपर की गोल रेखा के समान बल को (अभिभिनत्) सब प्रकार से भेदन करता है उसके (अंधसा) अन्नादि वा जल से (रध्वीरिव) जैसे जल से पूर्ण नदियां (प्रवणे) नीचे स्थान में जाती हैं वैसे (ऊतयः) रक्षा आदि (सस्रुः) गमन करती हैं ॥५॥

 

अन्वयः-

यद्यः सूर्यइव शस्त्राणां स्ववृष्टिं कुर्वन् धृषमाणो वज्रीन्द्रः सभाद्यध्यक्षो मदेऽस्य युध्यतः शत्रोस्त्रितः परिधींरिव बलमभिभिनदभितो भिनत्ति तस्यान्धसा रध्वीः प्रवण इवोतयः सस्रुः ॥५॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथाऽऽपो निम्नस्थानं प्रतिगच्छंति तथा सभाध्यक्षो नम्रो भूत्वा विनयं प्राप्नुयात् ॥५॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल नीचे स्थान को जाते हैं वैसे सभाध्यक्ष नम्र होकर विनय को प्राप्त होवे ॥५॥

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