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Mantra Rig 01.050.012

MANTRA NUMBER:

Mantra 12 of Sukta 50 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 7 of Varga 8 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 81 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- सूर्यः

छन्द: (Chhand) :- अनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

शुके॑षु मे हरि॒माणं॑ रोप॒णाका॑सु दध्मसि अथो॑ हारिद्र॒वेषु॑ मे हरि॒माणं॒ नि द॑ध्मसि

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं नि दध्मसि

 

The Mantra's transliteration in English

śukeu me harimāa ropaākāsu dadhmasi | atho hāridraveu me harimāa ni dadhmasi 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

शुके॑षु मे॒ ह॒रि॒माण॑म् रो॒प॒णाका॑सु द॒ध्म॒सि॒ अथो॒ इति॑ हा॒रि॒द्र॒वेषु॑ मे॒ ह॒रि॒माण॒म् नि द॒ध्म॒सि॒

 

The Pada Paath - transliteration

śukeu | me | harimāam | ropaākāsu | dadhmasi | atho iti | hāridraveu | me | harimāam | ni | dadhmasi 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५०।१२

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते किं कुर्य्युरित्याह इत्युपदिश्यते।

फिर वे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(शुक्रेषु) शुक्रवत्कृतेषु कर्मसु (मे) मम (हरिमाणम्) हरणशीलं रोगम् (रोपणाकासु) रोपणं समन्तात्कामयन्ति तासु क्रियासु लिप्तास्वोषधीषु (दध्मसि) धरेम (अथो) आनन्तर्ये (हारिद्रवेषु) ये हरन्ति द्रवन्ति द्रावयन्ति च तेषामेतेषु (मे) मम (हरिमाणम्) चित्ताकर्षकं व्याधिम् (नि) नितराम् (दध्मसि) स्थापयेम ॥१२॥

जैसे श्रेष्ठ वैद्य लोग कहें वैसे हम लोग (शुक्रेषु) शुत्रों के समान किये हुए कर्मो और (रोपणाकासु) लेप आदि क्रियाओं से (मे) मेरे (हरिमाणम्) चित्त को खैंचने वाले रोगनाशक ओषधियों को (दध्मसि) धारण करें (अथो) इसके पश्चात् (हारिद्रवेषु) जो सुख हरने मल बहाने वाले रोग हैं उनमें (मे) अपने (हरिमाणम्) हरणशील चित्त को (निदध्मसि) निरन्तर स्थिर करें ॥१२॥

 

अन्वयः-

यथा सद्वैद्या ब्रूयुस्तथा वयं शुक्रेषु रोपणाकासु मे हरिमाणं दध्मस्यथो हारिद्रवेषु मे मम हिरमाणं निदध्मसि ॥१२॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। मनुष्या लेपनादिक्रियाभिः सर्वान्रोगान्निवार्य बलं प्राप्नुवन्तु ॥१२॥

मनुष्य लोग लेपनादि क्रियाओं से रोगों का निवारण करके बल को प्राप्त होवें ॥१२॥

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