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Mantra Rig 01.050.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 50 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 8 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 79 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- सूर्यः

छन्द: (Chhand) :- निचृदनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम् दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम् देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्

 

The Mantra's transliteration in English

ud vaya tamasas pari jyoti paśyanta uttaram | deva devatrā sūryam aganma jyotir uttamam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उत् व॒यम् तम॑सः परि॑ ज्योतिः॑ पश्य॑न्तः उत्ऽत॑रम् दे॒वम् दे॒व॒ऽत्रा सूर्य॑म् अग॑न्म ज्योतिः॑ उ॒त्ऽत॒मम्

 

The Pada Paath - transliteration

ut | vayam | tamasa | pari | jyoti | paśyanta | ut-taram | devam | deva-trā | sūryam | aganma | jyoti | ut-tamam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५०।१०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तं विद्वांसः कीदृशं जानीयुरित्युपदिश्यते।

फिर उसको विद्वान्लोग किस प्रकार का जानें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(उत्) ऊर्ध्वेर्थे (वयम्) विद्वांसः (तमसः) आवरकादज्ञानादन्धकारात् (परि) परितः (ज्योतिः) ईश्वररचितं प्रकाशस्वरूपं सूर्य्यलोकं (पश्यन्तः) प्रेक्षमाणाः (उत्तरम्) सर्वोत्कृष्टं प्रलयादूर्ध्वं वर्त्तमानं संप्लवकर्त्तारम् (देवम्) दातारम् (देवत्रा) देवेषु विद्वत्सु मनुष्येषु पृथिव्यादिषु वा वर्त्तमानम् (सूर्य्यम्) सर्वात्मानम् (अगन्म) प्राप्नुयाम (ज्योतिः) प्रकाशम् (उत्तमम्) उत्कृष्टगुणकर्मस्वभावम् ॥१०॥

हे मनुष्यों ! जैसे (ज्योति) ईश्वर ने उत्पन्न किये प्रकाशमान सूर्य्य को (पश्यन्तः) देखते हुए (वयम्) हम लोग (तमसः) अज्ञानान्धकार से अलग होके (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूप (उत्तरम्) सबसे उत्तम प्रलय से ऊर्ध्व वर्त्तमान वा प्रलय करनेहारा (देवत्रा) देव मनुष्य पृथिव्यादिकों में व्यापक (देवम्) सुख देने (उत्तमम्) उत्कृष्ट गुण कर्म स्वभाव युक्त (सूर्य्यम्) सर्वात्मा ईश्वर को (पर्युदगन्म) सब प्रकार प्राप्त होवें वैसे तुम भी उस को प्राप्त होओ ॥१०॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या ! यथा ज्योतिः पश्यन्तो वयं तमसः पृथग्भूते ज्योतिरुत्तमं देवत्रा देवमुत्तमं ज्योतिः सूर्य्यं परात्मानं पर्य्युदगन्मोत्कृष्टतया प्राप्नुयाम तथा युयमप्येतं प्राप्नुत ॥१०॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैर्नहि परमेश्वरेण सदृशः कश्चिदुत्तमः प्रकाशकः पदार्थोस्ति न खल्वेतत्प्राप्तिमन्तरेण मुक्तिसुखं प्राप्तुं कोपि मनुष्योर्हतीति वेद्यम् ॥१०॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर के सदृश कोई भी उत्तम पदार्थ नहीं और न इसकी प्राप्ति के विना मुक्ति सुख को प्राप्त होने योग्य कोई भी मनुष्य हो सकता है ऐसा निश्चित जानें ॥१०॥

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