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Mantra Rig 01.050.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 50 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 8 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 78 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- सूर्यः

छन्द: (Chhand) :- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री;

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युव॒: सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्य॑: ताभि॑र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः

 

The Mantra's transliteration in English

ayukta sapta śundhyuva sūro rathasya naptya | tābhir yāti svayuktibhi 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युवः॑ सूरः॑ रथ॑स्य न॒प्त्यः॑ ताभिः॑ या॒ति॒ स्वयु॑क्तिऽभिः

 

The Pada Paath - transliteration

ayukta | sapta | śundhyuva | sūra | rathasya | naptya | tābhi | yāti | svayukti-bhiḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५०।०

मन्त्रविषयः-

पुनः सा #कीदृशीत्युपदिश्यते। *[हिन्दी लेखानुसार सः कीदृश इत्यु०। सं०]

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अयुक्त) योजयति (सप्त) पूर्वोक्ताः (शुन्ध्युवः) पवित्रहेतवो रश्मयोऽश्वाः। अत्र तन्वादीनां छन्दसि बहुलमुपसंख्यानम्। अ० ६।४।७७। अनेन वार्त्तिकेनोवङादेशः। (सूरः) यः सरति प्राप्नोति स सूर्यः (रथस्य) रमणाधिकरणस्य जगतो मध्ये (नप्तः) पातेन नाशेन रहिताः। अत्र सुपां सुलुग् इति जसः स्थाने सुः। नञुपपदात् पतधातोरिक्कृषादिभ्यः। अ० *३।१।८। इतीक्। तनिपत्योश्छन्दसि अ० ६।४।९९। अनेनोपधालोपः। इकारस्याकारादेशश्च। (ताभिः) व्याप्तिभिः (याति) प्राप्नोति (स्वयुक्तिभिः) स्वा युक्तयो योजनानि यासु ताभिः ॥९॥ #[अ ३।१०८ इति सूत्र स्थवार्तिकेनेक् प्र०। सं०।]

हे ईश्वर ! जैसे (सूरः) सबका प्रकाशक जो (सप्त) पूर्वोक्त सात (नप्तः) नाश से रहित (शुन्ध्युवः) शुद्धि करनेवाली किरणें हैं उनको (रथस्य) रमणीयस्वरूप में (अयुक्त) युक्त करता और उनसे सहित प्राप्त होता है वैसे आप (ताभिः) उन (स्वयुक्तिभिः) अपनी युक्तियों से सब संसार को संयुक्त रखते हो ऐसा हमको दृढ़ निश्चय है ॥९॥

 

अन्वयः-

हे ईश्वर ! यथा सूरो याः सप्त नप्तः शुन्ध्युवः सन्ति ता रथस्य मध्येऽयुक्त तैः सह याति प्राप्नोति तथा त्वं स्वयुक्तिभिः सर्वं विश्वं जगत्संयोजयसीति वयं विजानीमः ॥९॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यः सूर्यवत् स्वयं प्रकाश आकाशमिव व्याप्त उपासकानां शुद्धिकरः परमेश्वरोस्ति स खलु सर्वैर्मनुष्यैरुपासनीयो वर्त्तते ॥९॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जो सूर्य के समान आपही आपसे प्रकाश स्वरूप आकाश के तुल्य सर्वत्र व्यापक उपासकों को पवित्रकर्त्ता परमात्मा है वही सब मनुष्यों का उपास्यदेव है ॥९॥

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