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Mantra Rig 01.050.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 50 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 7 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 74 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- सूर्यः

छन्द: (Chhand) :- यवमध्याविराड्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

प्र॒त्यङ्दे॒वानां॒ विश॑: प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षान् प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

प्रत्यङ्देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान् प्रत्यङ्विश्वं स्वर्दृशे

 

The Mantra's transliteration in English

pratya devānā viśa pratyaṅṅ ud ei mānuān | pratya viśva svar dśe 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

प्र॒त्यङ् दे॒वाना॑म् विशः॑ प्र॒त्यङ् उत् ए॒षि॒ मानु॑षान् प्र॒त्यङ् विश्व॑म् स्वः॑ दृ॒शे

 

The Pada Paath - transliteration

pratya | devānām | viśa | pratya | ut | ei | mānuān | pratya | viśvam | sva | dśe 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५०।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स जगदीश्वरः कीदृशइत्युपदिश्यते।

फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(प्रत्यङ्) यः प्रत्यञ्चति सः (देवानाम्) दिव्यानां पदार्थानां विदुषां वा (विशः) प्रजाः (प्रत्यङ्) प्रत्यञ्चतीति (उत्) ऊर्ध्वे (एषि) (मानुषान्) मनुष्यान् (प्रत्यङ्) यत्प्रत्यञ्चति तत् (विश्वम्) सर्वम् (स्वः) सुखम् (दृशे) द्रष्टुम् ॥

हे जगदीश्वर ! जो आप (देवानाम्) दिव्य पदार्थों वा विद्वानों के (विशः) प्रजा (मानुषान्) मनुष्यों को (प्रत्यङ्ङुदेषि) अच्छे प्रकार प्राप्त हो और सब के आत्माओं में (प्रत्यङ्) प्राप्त होते हो इससे (विश्वस्वर्दृशे) सब सुखों के देखने के अर्थ सबों के (प्रत्यङ्) प्रत्यगात्मरूप से उपासनीय हो ॥

 

अन्वयः-

हे जगदीश्वर ! यस्त्वं देवानां विशो मानुषान् प्रत्यङ्ङुदेष्युत्कृष्टतया प्राप्तोसि सर्वेषामात्मसु प्रत्यङ्ङसि तस्माद्विश्वं स्वर्दृशे प्रत्यङ्ङुपासनीयोसि ॥

 

 

भावार्थः-

यत ईश्वरः सर्वव्यापकः सकलान्तर्यामी समस्तकर्मसाक्षी वर्त्तते तस्मादयमेव सर्वैः सज्जनैरुपासनीयोस्ति ॥

जिससे ईश्वर सब कहीं व्यापक सबके आत्मा का जाननेवाला और सब कर्मों का साक्षी है इसलिये यही सब सज्जन लोगों को नित्य उपासना करने के योग्य है ॥

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