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Mantra Rig 01.050.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 50 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 7 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 73 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- सूर्यः

छन्द: (Chhand) :- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री;

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त॒रणि॑र्वि॒श्वद॑र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य विश्व॒मा भा॑सि रोच॒नम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य विश्वमा भासि रोचनम्

 

The Mantra's transliteration in English

tarair viśvadarśato jyotikd asi sūrya | viśvam ā bhāsi rocanam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त॒रणिः॑ वि॒श्वऽद॑र्शतः ज्यो॒तिः॒ऽकृत् अ॒सि॒ सू॒र्य॒ विश्व॑म् भा॒सि॒ रो॒च॒नम्

 

The Pada Paath - transliteration

tarai | viśva-darśata | jyoti-kt | asi | sūrya | viśvam | ā | bhāsi | rocanam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५०।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृशइत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(तरणिः) क्षिप्रतया संप्लविता (विश्वदर्शतः) यो विश्वस्य दर्शयिता (ज्योतिष्कृत्) यो ज्योतिः प्रकाशात्मकैः सूर्यादिलोकं करोति सः (असि) (सूर्य) सर्वप्रकाशक सर्वात्मन् (विश्वम्) सर्वं जगत् (आ) समन्तात् (भासि) प्रकाशयसि (रोचनम्) अभिप्रेतं रुचिकरम् ॥

हे (सूर्य्य) चराचर के आत्मा ईश्वर ! जिससे (विश्वदर्शतः) विश्व के दिखाने और (तरणिः) शीघ्र सबका आक्रमण करने (ज्योतिष्कृत्) स्वप्रकाश स्वरूप आप ! (रोचनम्) रुचिकारक (विश्वम्) सब जगत् को प्रकाशित करते हैं इसीसे आप स्वप्रकाशस्वरूप हैं ॥

 

अन्वयः-

हे सूर्य्येश्वर ! यतो विश्वदर्शतस्तरणिर्ज्योतिष्कृत् त्वं रोचनं विश्वमाभासि तस्मात्स्वयं प्रकाशोऽसि

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यथा सूर्य्यविद्युतौ बाह्याभ्यन्तरस्थान्मूर्त्तान् पदार्थान् प्रकाशेतान्तथेश्वरः सर्वमखिलं जगत् प्रकाशयति ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सूर्य्य और बिजुली बाहर भीतर रहने वाले सब स्थूल पदार्थों को प्रकाशित करते हैं वैसे ही ईश्वर भी सब वस्तु मात्र को प्रकाशित करता है ॥

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