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Mantra Rig 01.050.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 50 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 7 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 72 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- सूर्यः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनाँ॒ अनु॑ भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु भ्राजन्तो अग्नयो यथा

 

The Mantra's transliteration in English

adśram asya ketavo vi raśmayo janām̐ anu | bhrājanto agnayo yathā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अदृ॑श्रम् अ॒स्य॒ के॒तवः॑ वि र॒श्मयः॑ जना॑न् अनु॑ भ्राज॑न्तः अ॒ग्नयः॑ य॒था॒

 

The Pada Paath - transliteration

adśram | asya | ketava | vi | raśmaya | janān | anu | bhrājanta | agnaya | yathā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०५०।०३

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते कीदृशा भवेयुरित्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अदृश्रम्) प्रेक्षेयम्। अत्र लिङर्थे लङ् शपो लुक् रुडागमश्च। (अस्य) सूर्य्यस्य (केतवः) ज्ञापकाः (वि) विशेषार्थे (रश्मयः) किरणाः (जनान्) मनुष्यादीन्प्राणिनः (अनु) पश्चात् (भ्राजन्तः) प्रकाशमानाः (अग्नयः) प्रज्वलिता वह्नयः (यथा) येन प्रकारेण ॥

(यथा) जैसे (अस्य) इस सविता के (भ्राजन्तः) प्रकाशमान (अग्नयः) प्रज्वलित (केतवः) जनानेवाली (रश्मयः) किरणें (जनान) मनुष्यादि प्राणियों को (अनु) अनुकूलता से प्रकाश करती हैं वैसे मैं अपनी विवाहित स्त्री और अपने पति ही को समागम के योग्य देखूं अन्य को नहीं ॥

 

अन्वयः-

यथाऽस्य सूर्य्यस्य भ्राजन्तोऽग्नयः केतवो रश्मयो जनाननुभ्राजन्तः सन्ति तथाहं स्वस्त्रियं स्वपुरुषञ्चैव गम्यत्वेन व्यदृश्रं नान्यथेति यावत्

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारः। यथा प्रदीप्ता अग्नयः सूर्य्यादयो वहिः सर्वेषु प्रकाशन्ते तथैवांतरात्मनीश्वरस्य प्रकाशो वर्त्तते। एतद्विज्ञानाय सर्वेषां मनुष्याणां प्रयत्नः कर्त्तुं योग्योस्ति तदाज्ञया परस्त्रीपुरुषैः सह व्यभिचारं सर्वथा विहाय विवाहिताः स्व स्व स्त्रीपुरुषा ऋतुगामिन एव स्युः ॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है। जैसे प्रज्वलित हुए अग्नि और सूर्य्यादिक बाहर सब में प्रकाशमान हैं वैसे ही अन्तरात्मा में ईश्वर का प्रकाश वर्त्तमान है इसके जानने के लिये सब मनुष्यों को प्रयत्न करना योग्य है उस परमात्मा की आज्ञा से परस्त्री के साथ पुरुष और परपुरुष के संग स्त्री व्यभिचार को सब प्रकार छोड़ के पाणिगृहीत अपनी-२ स्त्री और अपने-२ पुरुष के साथ ऋतुगामी ही होवें ॥

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