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Mantra Rig 01.048.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 48 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 4 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 56 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- उषाः

छन्द: (Chhand) :- विराट्पथ्याबृहती

स्वर: (Swar) :- मध्यमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ए॒षायु॑क्त परा॒वत॒: सूर्य॑स्यो॒दय॑ना॒दधि॑ श॒तं रथे॑भिः सु॒भगो॒षा इ॒यं वि या॑त्य॒भि मानु॑षान्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

एषायुक्त परावतः सूर्यस्योदयनादधि शतं रथेभिः सुभगोषा इयं वि यात्यभि मानुषान्

 

The Mantra's transliteration in English

eāyukta parāvata sūryasyodayanād adhi | śata rathebhi subhagoā iya vi yāty abhi mānuān 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ए॒षा अ॒यु॒क्त॒ प॒रा॒ऽवतः॒ सूर्य॑स्य उ॒त्ऽअय॑नात् अधि॑ श॒तम् रथे॑भिः सु॒ऽभगा॑ उ॒षाः इ॒यम् वि या॒ति॒ अ॒भि मानु॑षान्

 

The Pada Paath - transliteration

eā | ayukta | parāvata | sūryasya | ut-ayanāt | adhi | śatam | rathebhi | su-bhagā | uā | iyam | vi | yāti | abhi | mānuān 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तद्वत् स्त्रियः स्युरित्युपदिश्यते।

फिर उषा के समान स्त्री जन हों, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(एषा) वक्ष्यमाणा (अयुक्त) युंक्ते। अत्र लङर्थे #लुङ् बहुलं छन्दसि इति श्र्नमो लुक्। (परावतः) दूरदेशात् (सूर्य्यस्य) सवितृमंडलस्य (उदयनात्) उदयात् (अधि) उपरान्तसमये (शतम्) असंख्यातान् (रथेभिः) रमणीयैः किरणैः (सुभगा) शोभना भगा ऐश्वर्याणि यस्याः सा (उषाः) सुशोभा कान्तिः (इयम्) प्रत्यक्षा (वि) विविधार्थे (याति) प्राप्नोति (अभि) आभिमुख्ये (मानुषान्) मनुष्यादीन् ॥#[लङ्। सं]

हे स्त्री जनो ! जैसे (एषा) यह (उषाः) प्रातःकाल (सूर्य्यस्य) सूर्यमंडल के (उदयनात्) उदय से (अधि) उपरान्त (अध्यभ्ययुक्त) ऊपर सन्मुख से सब में युक्त होती है जिस प्रकार (इयम्) यह (सुभगा) उत्तम ऐश्वर्य्ययुक्त (रथेभिः) रमणीय यानों से (शतम्) असंख्यात (मानुषान्) मनुष्यादिकों को (वियाति) विविध प्रकार प्राप्त होता है वैसे तुम भी युक्त होओ ॥

 

अन्वयः-

हे स्त्रियो ! यूयं यथैषोषाः परावतः सूर्यस्योदयनादध्यभ्ययुक्त यथेयं सुभगा रथेभिः शतं मानुषान् वियाति तथैव युक्ता भवत ॥

 

 

भावार्थः-

यथा पतिव्रताः स्त्रियो नियमेन स्वपतीन् सेवन्ते यथोषसः पदार्थानां च दूरदेशात्संयोगो जायते तथैव दूरस्थैः कन्यावरैर्विवाहः कर्त्तव्यो यतो दूरदेशेपि प्रीतिर्वर्द्धेत तथा समीपस्थानां विवाहः क्लेशकारी भवति तथैव दूरस्थानां च सुखदायी जायते ॥

जैसे पतिव्रता स्त्रियां नियम से अपने पतियों की सेवा करती हैं। जैसे उषा से सब पदार्थों का दूर देश से संयोग होता है वैसे दूरस्थ कन्या पुत्रों का युवावस्था में स्वयंवर विवाह करना चाहिये जिससे दूरदेश में रहनेवाले मनुष्यों से प्रीति बढ़े जैसे निकटस्थों का विवाह दुःखदायक होता है वैसे ही दूरस्थों का विवाह आनन्दप्रद होता है ॥

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