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Mantra Rig 01.048.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 48 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 3 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 53 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- उषाः

छन्द: (Chhand) :- विराट्सतःपङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उषो॒ ये ते॒ प्र यामे॑षु यु॒ञ्जते॒ मनो॑ दा॒नाय॑ सू॒रय॑: अत्राह॒ तत्कण्व॑ एषां॒ कण्व॑तमो॒ नाम॑ गृणाति नृ॒णाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उषो ये ते प्र यामेषु युञ्जते मनो दानाय सूरयः अत्राह तत्कण्व एषां कण्वतमो नाम गृणाति नृणाम्

 

The Mantra's transliteration in English

uo ye te pra yāmeu yuñjate mano dānāya sūraya | atrāha tat kava eā kavatamo nāma gṛṇāti nṛṇām 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उषः॑ ये ते॒ प्र यामे॑षु यु॒ञ्जते॑ मनः॑ दा॒नाय॑ सू॒रयः॑ अत्र॑ अह॑ तत् कण्वः॑ ए॒षा॒म् कण्व॑ऽतमः नाम॑ गृ॒णा॒ति॒ नृ॒णाम्

 

The Pada Paath - transliteration

ua | ye | te | pra | yāmeu | yuñjate | mana | dānāya | sūraya | atra | aha | tat | kava | eām | kava-tama | nāma | gṛṇāti | nṛṇām 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४।०

मन्त्रविषयः-

य उषसि योगमभ्यस्यन्ति ते किं प्राप्नुवन्तीत्याह।

जो प्रभात समय में योगाभ्यास करते हैं, वे किसको प्राप्त होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(उषः) उषसः (ये) (ते) तव (प्र) प्रकृष्टार्थे (यामेषु) प्रहरेषु (युञ्जते) अभ्यस्यन्ति (मनः) विज्ञानं (दानाय) विद्यादिदानाय (सूरयः) स्तोतारो विद्वांसः। सूरिरिति स्तोतृना० निघं० ३।१। (अत्र) अस्यां विद्यायाम् (अह) विनिग्रहार्थे। अह इति विनिग्रहार्थीयः। निरु० १।१। (तत्) (कण्वः) मेधावी (एषाम्) (कण्वतमः) अतिशयेन मेधावी (नाम) सञ्ज्ञादिकम् (गृणाति) प्रशंसति (नृणाम्) विद्याधर्मेषु नायकानां मनुष्याणां मध्ये ॥४॥

हे विद्वन् जो (सूरयः) स्तुति करनेवाले विद्वान् लोग ! (ते) आपसे उपदेश पाके (अत्र) इस (उषः) प्रभात के (यामेषु) प्रहरों में (दानाय) विद्यादि दान के लिये (मनः) विज्ञान युक्त चित्त को (प्रयुंजते) प्रयुक्त करते हैं वे जीवन्मुक्त होते हैं और जो (कण्वः) मेधावी (एषाम्) इन (नृणाम्) प्रधान विद्वानों के (नाम) नामों को (गृणाति) प्रशंसित करता है वह (कण्वतमः) अतिशय मेधावी होता है ॥४॥

 

अन्वयः-

हे विद्वन् ! ये सूरयस्ते तव सकाशादुपदेशं प्राप्यात्रोषर्यामेषु दानाय मनोऽह प्रयुंजते ते सिद्धा भवन्ति यः कण्व एषां मृणां नाम गृणाति स कण्वतमो जायते ॥४॥

 

 

भावार्थः-

ये जना एकान्ते पवित्रे निरुपद्रवे देशे स्वासीना यमादिसंयमान्तानां नवानामुपासनांगानामभ्यासं कुर्वन्ति ते निर्मलात्मानः सन्तः प्राज्ञा आप्ताः सिद्धा जायन्ते ये चैतेषां संगसेवे विदधति तेऽपि शुद्धान्तः करणा भूत्वाऽत्मयोगजिज्ञासवो भवन्ति ॥४॥

जो मनुष्य एकान्त पवित्र निरुपद्रव देश में स्थिर होकर यमादि संयमान्त उपासना के नव अंगों का अभ्यास करते हैं वे निर्मल आत्मा होकर ज्ञानी श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं और जो इनका संग और सेवा करते हैं वे भी शुद्ध अन्तःकरण होके आत्मयोग के जानने के अधिकारी होते हैं ॥४॥

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