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Mantra Rig 01.047.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 47 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 2 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 45 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- निचृत्सतः पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

सु॒दासे॑ दस्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॒ पृक्षो॑ वहतमश्विना र॒यिं स॑मु॒द्रादु॒त वा॑ दि॒वस्पर्य॒स्मे ध॑त्तं पुरु॒स्पृह॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

सुदासे दस्रा वसु बिभ्रता रथे पृक्षो वहतमश्विना रयिं समुद्रादुत वा दिवस्पर्यस्मे धत्तं पुरुस्पृहम्

 

The Mantra's transliteration in English

sudāse dasrā vasu bibhratā rathe pko vahatam aśvinā | rayi samudrād uta vā divas pary asme dhattam puruspham 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सु॒ऽदासे॑ द॒स्रा॒ वसु॑ बिभ्र॑ता रथे॑ पृक्षः॑ व॒ह॒त॒म् अ॒श्वि॒ना॒ र॒यिम् स॒मु॒द्रात् उ॒त वा॒ दि॒वः परि॑ अ॒स्मे इति॑ ध॒त्त॒म् पु॒रु॒ऽस्पृह॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

su-dāse | dasrā | vasu | bibhratā | rathe | pka | vahatam | aśvinā | rayim | samudrāt | uta | vā | diva | pari | asme iti | dhattam | puru-spham 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(सुदासे) सुष्ठु शोभना दासा यस्य तस्मिन् (दस्रा) शत्रूणामुपक्षेतारौ (वसु) विद्यादिधनसमूहम् (बिभ्रता) धरन्तौ (रथे) विमानादियाने (पृक्षः) सुखसंपर्कनिमित्तं विज्ञानम्। अत्र पृचीधातोः बाहुलकाद् औणादिकोऽसुन्प्रत्ययस्तस्य सुडागमश्च। (वहतम्) प्रापयतम् (अश्विना) वायुविद्युदादिरिव व्याप्तैश्वर्य्यौ (रयिम्) राजश्रियम् (समुद्रात्) सागरादन्तरिक्षाद्वा (उत) अपि (वा) पक्षान्तरे (दिवः) द्योतनात्मकात्सूर्यात् (परि) सर्वतः (अस्मे) अस्मभ्यम् (धत्तम्) (पुरुस्पृहम्) यत्सत्पुरुषैर्बहुभिः स्पृह्यत ईप्स्यते तत् ॥६॥

हे (दस्रा) शत्रुओं के नाश करनेवाले (वसु) विद्यादिधन समूह को (बिभ्रता) धारण करते हुए (अश्विना) वायु और बिजुली के समान पूर्ण ऐश्वर्य युक्त आप ! जैसे (सुदासे) उत्तम सेवक युक्त (रथे) विमानादि यान में (समुद्रात्) सागर वा सूर्य से (उत) और (दिवः) प्रकाशयुक्त आकाश से पार (पृक्षः) सुख प्राप्ति का निमित्त (पुरुस्पृहम्) जो बहुत का इच्छित हो उस (रयिम्) राज्यलक्ष्मी को धारण करें वैसे (अस्मे) हमारे लिये (परिधत्तम्) धारण कीजिये ॥६॥

 

अन्वयः-

हे दस्रा वसु बिभ्रताऽश्विनेव ! युवां सुदासे रथे समुद्रादुत दिवः पारेऽस्मे पृक्षो वहतं पुरुस्पृहं रयिं च परिधत्तम् ॥६॥

 

 

भावार्थः-

सभेशादिभिः राजपुरुषैः सेनाप्रजार्थं विविधं धनं समुद्रादिपाराऽवारगमनाय विमानादियानानि च संपाद्य सुखोन्नतिः कार्य्येति ॥६॥

राज पुरुषों को योग्य है कि सेना और प्रजा के अर्थ नाना प्रकार का धन और समुद्रादि के पार जाने के लिये विमान आदि यान रचकर सब प्रकार सुख की उन्नति करें ॥६॥

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