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Mantra Rig 01.047.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 47 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 1 of Adhyaya 4 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 41 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- निचृत्सतः पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॑ सु॒पेश॑सा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना कण्वा॑सो वां॒ ब्रह्म॑ कृण्वन्त्यध्व॒रे तेषां॒ सु शृ॑णुतं॒ हव॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना कण्वासो वां ब्रह्म कृण्वन्त्यध्वरे तेषां सु शृणुतं हवम्

 

The Mantra's transliteration in English

trivandhurea trivtā supeśasā rathenā yātam aśvinā | kavāso vām brahma kṛṇvanty adhvare teā su śṛṇuta havam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्रि॒ऽव॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒ऽवृता॑ सु॒ऽपेश॑सा रथे॑न या॒त॒म् अ॒श्वि॒ना॒ कण्वा॑सः वा॒म् ब्रह्म॑ कृ॒ण्व॒न्ति॒ अ॒ध्व॒रे तेषा॑म् सु शृ॒णु॒त॒म् हव॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

tri-vandhurea | tri-vtā | su-peśasā | rathena | ā | yātam | aśvinā | kavāsa | vām | brahma | kṛṇvanti | adhvare | teām | su | śṛṇutam | havam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४।०२

मन्त्रविषयः-

ताभ्यां साधितेन #किं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते। #[यानेन। सं]

उससे सिद्ध किये हुए यान से क्या करना चाहिये इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्रिबंधुरेण) त्रीणि बन्धुराणि बंधनानि यस्मिंस्तेन (त्रिवृता) त्रिभिः शिल्पक्रियाप्रकारैः प्रपूरितस्तेन (सुपेशसा) शोभनं पेशो रूपं हिरण्यं वा यस्मिन् तेन। पेश इतिरूपना०। निघं० ३।। हिरण्यना० च निघं० १।२। (रथेन) विमानादिना (आ) अभितः (यातम्) गच्छतम् (अश्विना) अग्निजले इव वर्त्तमानौ (कण्वासः) मेधाविनः (वाम्) एतयोः सकाशात् (ब्रह्म) अन्नम्। ब्रह्मेत्यन्नना० निघं० २।। (कृण्वन्ति) कुर्वन्ति (अध्वरे) संगते शिल्पक्रियासिद्धे याने (तेषाम्) मेधाविनाम् (सु) शोभनार्थे (शृणुतम्) (हवम्) ग्राह्यं विद्याशब्दसमूहम् ॥२॥

हे (अश्विना) पावक और जल के तुल्य सभा और सेना के ईश ! तुम लोग जैसे (कण्वासः) बुद्धिमान् लोग (अध्वरे) अग्निहोत्रादि वा शिल्पक्रिया से सिद्ध यज्ञ में जिस (त्रिबन्धुरेण) तीन बन्धनयुक्त (त्रिवृता) तीन शिल्पक्रिया के प्रकारों से पूरित (सुपेशसा) उत्तम रूप वा सोने से जटित (रथेन) विमान आदि यान से देश देशान्तरों में शीघ्र जा आके (ब्रह्म) अन्नादि पदार्थों को (कृण्वन्ति) करते हैं वैसे उससे देश देशान्तर और द्वीपद्वीपान्तरों को (आयातम्) जाओ आओ (तेषाम्) उन बुद्धिमानों का (हवम्) ग्रहण करने योग्य विद्याओं के उपदेश को (शृणुतम्) सुनो और अन्नादि समृद्धि को बढ़ाया करो ॥२॥

 

अन्वयः-

हे अश्विना वर्त्तमानौ सभासेनेशौ ! युवां यथा कण्वासोऽध्वरे येन त्रिबंधुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेन देशदेशाऽन्तरं शीघ्रं गत्वाऽऽगत्य ब्रह्म कृण्वन्ति तथा तेनायातम्। तेषां हवं सुशृणुतमन्नादिसमृद्धि च वर्द्धयतम् ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। मनुष्यैर्विदुषां सकाशात् पदार्थविज्ञानपुरःसरां यज्ञशिल्पहस्तक्रियां साक्षात्कृत्वा व्यवहारकृत्यानि निष्पादनीयानि ॥२॥

यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सङ्ग से पदार्थ विज्ञानपूर्वक यज्ञ और शिल्पविद्या की हस्तक्रिया को साक्षात् करके व्यवहाररूपी कार्यों को सिद्ध करें ॥२॥

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