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Mantra Rig 01.045.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 45 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 32 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 20 of Anuvaak 9 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- प्रस्कण्वः काण्वः

देवता (Devataa) :- अग्निर्देवाः

छन्द: (Chhand) :- विराडनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वां चि॑त्रश्रवस्तम॒ हव॑न्ते वि॒क्षु ज॒न्तव॑: शो॒चिष्के॑शं पुरुप्रि॒याग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोळ्हवे

 

The Mantra's transliteration in English

tvā citraśravastama havante viku jantava | śocikeśam purupriyāgne havyāya vohave 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वाम् चि॒त्र॒श्र॒वः॒ऽत॒म॒ हव॑न्ते वि॒क्षु ज॒न्तवः॑ शो॒चिःऽके॑शम् पु॒रु॒ऽप्रि॒य॒ अग्ने॑ ह॒व्याय॑ वोळ्ह॑वे

 

The Pada Paath - transliteration

tvām | citraśrava-tama | havante | viku | jantava | śoci-keśam | puru-priya | agne | havyāya | vohave 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तं कीदृशं गृह्णीयुरित्युपदिश्यते।

फिर उसको किस प्रकार ग्रहण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्वाम्) (चित्रश्रवस्तम्) चित्राण्यद्भुतानि श्रवांस्यतिशयितान्यन्नादीनि यस्य तत्सम्बुद्धौ (हवन्ते) स्पर्द्धन्ते (विक्षु) प्रजासु (जन्तवः) मनुष्याः। जन्तव इति मनुष्यना०। निघं० २।३। (शोचिष्केशम्) शोचिषः शुद्धाचाराः केशाः प्रकाशका यस्य तम् (पुरुप्रिय) यः पुरून् बहून् प्रीणाति तत्सम्बुद्धौ (अग्ने) विद्वन् (हव्याय) होतुमर्हाय यज्ञाय (वोढवे) विद्याप्रापणाय ॥६॥

हे (चित्रश्रवस्तम) अत्यन्त अद्भुत अन्न वा श्रवणों से व्युत्पन्न (पुरुप्रिय) बहुतों को तृप्त करनेवाले (अग्ने) बिजुली के तुल्य विद्याओं में व्यापक विद्वान् ! जो (जन्तवः) प्राणी लोग (विक्षु) प्रजाओं में (वोढवे) विद्या प्राप्ति कराने हारे (हव्याय) ग्रहण करने योग्य पठन पाठनरूप यज्ञ के लिये जिस (शोचिष्केशम्) जिसके पवित्र आचरण हैं उस (त्वाम्) आपको (हवन्ते) ग्रहण करते हैं, वह आप उनको विद्या और शिक्षा देकर विद्वान् और शील युक्त शीघ्र कीजिये ॥६॥

 

अन्वयः-

हे चित्रश्रवसस्तम पुरुप्रियाग्ने विद्युदिव विद्वन् ! ये जन्तवो विक्ष वोढवे हव्याय यं शोचिष्केशं त्वां हवन्ते स त्वं तान् विद्यासुशिक्षाप्रदानेन विदुषः सुशीलान् सद्यः संपादय ॥६॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैरनेकगुणाग्निवद्वर्त्तमानं विद्वांसं प्राप्य विद्याः सततं ग्राह्याः ॥६॥

मनुष्यों को उचित हैं कि अनेक गुणयुक्त अग्नि के समान विद्वान् को प्राप्त होके विद्याओं का ग्रहण करें ॥६॥

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