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Mantra Rig 01.042.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 42 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 25 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 85 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- पूषा

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒भि सू॒यव॑सं नय॒ न॑वज्वा॒रो अध्व॑ने पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अभि सूयवसं नय नवज्वारो अध्वने पूषन्निह क्रतुं विदः

 

The Mantra's transliteration in English

abhi sūyavasa naya na navajvāro adhvane | pūann iha kratu vida 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒भि सु॒ऽयव॑सम् न॒य॒ न॒व॒ऽज्वा॒रः अध्व॑ने पूष॑न् इ॒ह क्रतु॑म् वि॒दः॒

 

The Pada Paath - transliteration

abhi | su-yavasam | naya | na | nava-jvāra | adhvane | pūan | iha | kratum | vidaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४२।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तेन किं प्रापणीयमित्युपदिश्यते।

फिर उसने किसको प्राप्त होना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अभि) आभिमुख्ये (सुयवसम्) शोभनो यवाद्योषधिसमूहो यस्मिन्देशे तम्। अत्र अन्येषामपिदृश्यते इति दीर्घः। (नय) प्रापय (न) निषेधार्थे (नवज्वारः) यो नवो नूतनश्चासौ ज्वारः संतापश्च सः (अध्वने) मार्गाय (पूषन्) सभाध्यक्ष (इह) उक्तार्थम् (विदः) प्राप्नुहि ॥८॥

हे (पूषन्) सभाध्यक्ष ! इस संसार वा जन्मांतर में (अध्वने) श्रेष्ठ मार्ग के लिये हम लोगों को (सुयवसम्) उत्तम यव आदि ओषधी होनेवाले देश को (अभिनय) सब प्रकार प्राप्त कीजिये और (क्रतुम्) उत्तम कर्म वा प्रज्ञा को (विदः) प्राप्त हूजिये जिससे इस मार्ग में चलके हम लोगों में (नवज्वारः) नवीन-२ सन्ताप (न) न हों ॥८॥

 

अन्वयः-

हे पूषंस्त्वमिहाऽधवने सुयवसं देशमभिनय तेन मार्गेण क्रतुं विदो येन त्वयि नवज्वारो न भवेत् ॥८॥

 

 

भावार्थः-

हे परमेश्वर ! भवान् स्वकृपया श्रेष्ठदेशं गुणाँश्चास्मभ्यं देहि। सर्वाणि दुःखानि निवार्य्य सुखानि प्रापय हे विद्वन् सभाध्यक्ष ! त्वमस्मान् विनयेन पालयित्वा विद्यां शिक्षयित्वाऽस्मिन्राज्ये सुखयेति ॥८॥

हे सभाध्यक्ष ! आप अपनी कृपा से श्रेष्ठ देश वा उत्तम गुण हम लोगों को दीजिये और सब दुःखों को निवारण कर सुखों को प्राप्त कीजिये, हे सभासेनाध्यक्ष ! विद्वान् लोगों को विनयपूर्वक पालन से विद्या पढ़ाकर इस राज्य में सुख युक्त कीजिये ॥८॥

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