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Mantra Rig 01.041.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 41 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 23 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 74 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- आदित्याः

छन्द: (Chhand) :- विराड्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

रत्नं॒ मर्त्यो॒ वसु॒ विश्वं॑ तो॒कमु॒त त्मना॑ अच्छा॑ गच्छ॒त्यस्तृ॑तः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

रत्नं मर्त्यो वसु विश्वं तोकमुत त्मना अच्छा गच्छत्यस्तृतः

 

The Mantra's transliteration in English

sa ratnam martyo vasu viśva tokam uta tmanā | acchā gacchaty astta 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः रत्न॑म् मर्त्यः॑ वसु॑ विश्व॑म् तो॒कम् उ॒त त्मना॑ अच्छ॑ ग॒च्छ॒ति॒ अस्तृ॑तः

 

The Pada Paath - transliteration

sa | ratnam | martya | vasu | viśvam | tokam | uta | tmanā | accha | gacchati | asttaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४१।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स संरक्षितः सन् मनुष्यः किं प्राप्नोतीत्युपदिश्यते।

फिर वह रक्षा को प्राप्त होकर किसको प्राप्त होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(सः) वक्ष्यमाणः (रत्नम्) रमन्ते जनानां मनांसि यस्मिंस्तत् (मर्त्यः) मनुष्यः (वसु) उत्तमं द्रव्यम् (विश्वम्) सर्वम् (तोकम्) उत्तमगुणवदपत्यम्। तोकमित्यपत्यना०। निघं० २।२। (उत) अपि (त्मना) आत्मना मनसा प्राणेन वा। अत्र मंत्रेष्वाङ्यादेरात्मनः। अ० ।११। अनेनास्याकारलोपः। (अच्छ) सम्यक् प्रकारेण। अत्र निपातस्य च इति दीर्घः। (गच्छति) प्राप्नोति (अस्तृतः) अहिंसितस्सन् ॥६॥

जो (अस्तृतः) हिंसा रहित (मर्त्येः) मनुष्य है (सः) वह (त्मना) आत्मा मन वा प्राण से (विश्वम्) सब (रत्नम्) मनुष्यों के मनों के रमण करानेवाले (वसु) उत्तम से उत्तम द्रव्य (उत) और (तोकम्) सब उत्तम गुणों से युक्त पुत्रों को (अच्छ गच्छति) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है ॥६॥

 

अन्वयः-

योऽस्तृतोऽहिंसितो मर्त्यो मनुष्योऽस्ति स त्मनाऽऽत्मना विश्वम् रत्नम् सूतापि तोकमच्छ गच्छति ॥६॥

 

 

भावार्थः-

विद्वद्भिर्मनुष्यैः सम्यग्रक्षिता मनुष्यादयः प्राणिनः सर्वानुत्तमान् पदार्थान् सन्तानांश्च प्राप्नुवन्ति नैतेन विना कस्यचिद्वृद्धिर्भवतीति ॥६॥

विद्वान् मनुष्यों से अच्छे प्रकार रक्षा किये हुए मनुष्य आदि प्राणी सब उत्तम से उत्तम पदार्थ और सन्तानों को प्राप्त होते हैं रक्षा के विना किसी पुरुष वा प्राणी की बढ़ती नहीं होती ॥६॥

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