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Mantra Rig 01.041.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 41 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 22 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 73 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- आदित्याः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यं य॒ज्ञं नय॑था नर॒ आदि॑त्या ऋ॒जुना॑ प॒था प्र व॒: धी॒तये॑ नशत्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यं यज्ञं नयथा नर आदित्या ऋजुना पथा प्र वः धीतये नशत्

 

The Mantra's transliteration in English

ya yajña nayathā nara ādityā junā pathā | pra va sa dhītaye naśat 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यम् य॒ज्ञम् नय॑थ न॒रः॒ आदि॑त्याः ऋ॒जुना॑ प॒था प्र वः॒ सः धी॒तये॑ न॒श॒त्

 

The Pada Paath - transliteration

yam | yajñam | nayatha | nara | ādityā | junā | pathā | pra | va | sa | dhītaye | naśat 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४१।०

मन्त्रविषयः-

पुनरेते कं संरक्ष्य किं प्राप्नुयुरित्युपदिश्यते।

फिर ये किस की रक्षा कर किस को प्राप्त होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(यम्) वक्ष्यमाणम् (यज्ञम्) शत्रुनाशकं श्रेष्ठपालनाख्यं राजव्यवहारम् (नयथ) प्राप्नुथ। अत्रान्येषामपि इति दीर्घः। (नरः) नयन्ति सत्यं व्यवहारं प्राप्नुवन्त्यसत्यं च दूरीकुर्वंति तत्सम्बुद्धौ (आदित्याः) पूर्वोक्ता वरुणादयो विद्वांसः (ऋजुना) सरलेन शुद्धेन (पथा) न्यायमार्गेण (प्र) प्रकृष्टार्थे (वः) युष्माकम् (सः) यज्ञः (धीतये) धीयन्ते प्राप्यन्ते सुखान्यनया क्रियया सा (नशत्) नाशं प्राप्नुयात्। अत्र व्यत्ययेन शप् लेट् प्रयोगश्च ॥५॥

हे (आदित्याः) सकलविद्याओं से सूर्य्यवत् प्रकाशमान (नरः) न्याययुक्त राजसभासदो ! आप लोग (धीतये) सुखों को प्राप्त करानेवाली क्रिया के लिये (यम्) जिस (यज्ञम्) राजधर्मयुक्त व्यवहार को (ऋजुना) शुद्ध सरल (पथा) मार्ग से (नयथ) प्राप्त होते हो (सः) सो (वः) तुम लोगों को (प्रणशत्) नष्ट करने हारा नहीं होता ॥५॥

 

अन्वयः-

हे आदित्या ! नरो यूयं धीतये यं यज्ञमृजुना पथा नयथ (स वः# प्रणशत् यूयमपि नयथ)। एवं कृते सति सयज्ञो वो युष्माकं धीतये न प्रणशत् नाशं न प्राप्नुयात् ॥५॥ #[कोष्ठान्तर्गतपाठोऽधिकः प्रतीयते। सं०]

 

 

भावार्थः-

अत्र पूर्वस्मान्मंत्रान्नेत्यनुवर्तते यत्र विद्वांसः सभासेनाध्यक्षाः सभास्थाः सभ्याः भृत्यांश्च भूत्वा विनयं कुर्वन्ति तत्र न किंचिदपि सुखं नश्यतीति ॥५॥

इस मन्त्र में पूर्व मंत्र से (न) इस पद की अनुवृत्ति हैं जहां विद्वान् लोग सभा सेनाध्यक्ष सभा में रहनेवाले भृत्य होकर विनयपूर्वक न्याय करते हैं, वहां सुख का नाश कभी नहीं होता ॥५॥

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