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Mantra Rig 01.041.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 41 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 22 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 69 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- वरुणमित्रार्यमणः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यं रक्ष॑न्ति॒ प्रचे॑तसो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा नू चि॒त्स द॑भ्यते॒ जन॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा नू चित्स दभ्यते जनः

 

The Mantra's transliteration in English

ya rakanti pracetaso varuo mitro aryamā | nū cit sa dabhyate jana 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यम् रक्ष॑न्ति प्रऽचे॑तसः वरु॑णः मि॒त्रः अ॒र्य॒मा नु चि॒त् सः द॒भ्य॒ते॒ जनः॑

 

The Pada Paath - transliteration

yam | rakanti | pra-cetasa | varua | mitra | aryamā | nu | cit | sa | dabhyate | janaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४१।०१

मन्त्रविषयः-

अनेकैः सुरक्षितोपि कदाचिच्छत्रुणापीड्यत इत्युपदिश्यते।

अनेक वीरों से रक्षित भी राजा कभी शत्रु से पीड़ित होता ही है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(यम्) सभासेनेशं मनुष्यं (रक्षन्ति) पालयन्ति (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतो विज्ञानं येषान्ते (वरुणः) उत्तम गुणयोगेन श्रेष्ठत्वात्सर्वाध्यक्षत्वार्हः (मित्रः) सर्वसुहृत् (अर्यमा) पक्षपातं विहाय न्यायं कर्त्तुं समर्थः (नु) सद्यः। अत्र ऋचितुनु०। इति दीर्घः। (चित्) एव (सः) रक्षितः (दभ्यते) हिंस्यते (जनः) प्रजासेनास्थो मनुष्यः ॥१॥

(प्रचेतसः) उत्तमज्ञानवान् (वरुणः) उत्तम गुण वा श्रेष्ठपन होने से सभाध्यक्ष होने योग्य (मित्रः) सबका मित्र (अर्यमा) पक्षपात छोड़कर न्याय करने को समर्थ ये सब (यम्) जिस मनुष्य वा राज्य तथा देश की (रक्षन्ति) रक्षा करते हों (सः) (चित्) वह भी (जनः) मनुष्य आदि (नु) जल्दी सब शत्रुओं से कदाचित् (दभ्यते) मारा जाता है ॥१॥

 

अन्वयः-

प्रचेतसो वरुणो मित्रोर्यमा चैते यं रक्षन्ति स चिदपि कदाचिन्नु दभ्यते ॥१॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैः सर्वोत्कृष्टः सेनासभाध्यक्षः सर्वमित्रो दूतोऽध्यापक उपदेष्टा धार्मिको न्यायाधीशश्च कर्त्तव्यः। तेषां सकाशाद्रक्षणादीनि प्राप्य सर्वान् शत्रून् शीघ्रं हत्वा चक्रवर्त्तिराज्यं प्रशास्य सर्वहितं संपादनीयम्। नात्र केनचिन्मृत्युना भेतव्यं कुतः सर्वेषां जातानां पदार्थानां ध्रुवो मृत्युरित्यतः ॥१॥

मनुष्यों को उचित है कि सबसे उत्कृष्ट सेना सभाध्यक्ष सबका मित्र दूत पढ़ाने वा उपदेश करनेवाले धार्मिक मनुष्य को न्यायाधीश करें; तथा उन विद्वानों के सकाश से रक्षा आदि को प्राप्त हो सब शत्रुओं को शीघ्र मार और चक्रवर्त्तिराज्य का पालन करके सबके हित को संपादन करें किसी को भी मृत्यु से भय करना योग्य नहीं है क्योंकि जिनका जन्म हुआ है उनका मृत्यु अवश्य होता है। इसलिये मृत्यु से डरना मूर्खों का काम है ॥१॥

 

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