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Mantra Rig 01.040.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 40 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 21 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 66 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- बृहस्पतिः

छन्द: (Chhand) :- सतःपङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

तमिद्वो॑चेमा वि॒दथे॑षु श॒म्भुवं॒ मन्त्रं॑ देवा अने॒हस॑म् इ॒मां च॒ वाचं॑ प्रति॒हर्य॑था नरो॒ विश्वेद्वा॒मा वो॑ अश्नवत्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

तमिद्वोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम् इमां वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद्वामा वो अश्नवत्

 

The Mantra's transliteration in English

tam id vocemā vidatheu śambhuvam mantra devā anehasam | imā ca vācam pratiharyathā naro viśved vāmā vo aśnavat 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

तम् इत् वो॒चे॒म॒ वि॒दथे॑षु श॒म्भुव॑म् मन्त्र॑म् दे॒वाः॒ अ॒ने॒हस॑म् इ॒माम् च॒ वाच॑म् प्रति॒ऽहर्य॑थ न॒रः॒ विश्वा॑ इत् वा॒मा वः॒ अ॒श्न॒व॒त्

 

The Pada Paath - transliteration

tam | it | vocema | vidatheu | śambhuvam | mantram | devā | anehasam | imām | ca | vācam | prati-haryatha | nara | viśvā | it | vāmā | va | aśnavat 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।००।०

मन्त्रविषयः-

अथ सर्वमनुष्यार्था वेदाः संतीत्युपदिश्यते।

अब अगले मंत्र में सब मनुष्यों के लिये वेदों के पढ़ने का अधिकार है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(तम्) वेदम् (इत्) एव (वोचेम) उपदिशेम। अन्येषामपीति दीर्घः। (विदथेषु) विज्ञानेषु पठनपाठनव्यवहारेषु कर्तव्येषु सत्सु। विदथानि वेदनानि विदथानि प्रचोदयादित्यपि निगमो भवति। निरु० । (शंभुवम्) शं कल्याणं यस्मात्तम्। अत्र शम्युपपदे भुवः# संज्ञान्तरयोः इति क्विप् कृतोबहुलम् इति हेतौ (मन्त्रम्) मन्यते गुप्ताः पदार्थाः परिभाषन्ते येन तम् मंत्रा मननात्। निरु० ।१२। (देवाः) विद्वांसः (अनेहसम्) अहिंसनीयं सर्वदा रक्ष्यं निर्दोषम्। अत्र नञिहन एह च। उ० ।*२३१। इति नञ्पूर्वकस्य हन् धातोः प्रयोगः (इमाम्) वेदचतुष्टयीम् (च) सत्यविद्यान्वयसमुच्चये (वाचम्) वाणीम् (प्रतिहर्यथ) पुनः पुनर्विजानीथ। अत्र अन्येषामपि इति दीर्घः। (नरः) विद्यानेतारः (विश्वा) सर्वा (इत्) यदि (वामा) प्रशस्ता वाक्। वाम इति प्रशस्यनामसु पठितम्। निघं० ३।। (वः) युष्मान् युष्मभ्यं वा (अश्नवत्) प्राप्नुयात्। अयं लेट् प्रयोगो व्यत्ययेन परस्मैपदं च ॥#[अ३।२।१७९।] *[उ ४।२२४।]

हे (देवाः) विद्वानो ! (वः) तुम लोगों के लिये हम लोग (विदथेषु) जानने योग्य पढ़ने-पढ़ाने आदि व्यवहारों में जिस (अनेहसम्) अहिंसनीय सर्वदा रक्षणीय दोषरहित (शंभुवम्) कल्याणकारक (मंत्रम्) पदार्थों को मनन करानेवाले मंत्र अर्थात् श्रुति समूह को (वोचेम) उपदेश करें (तम्) उस वेद को (इत्) ही तुम लोग ग्रहण करो (इत्) जो (इमाम्) इस (वाचम्) वेदवाणी को बार-२ जानों तो (विश्वा) सब (वामा) प्रशंसनीय वाणी (वः) तुम लोगों को (अश्नवत्) प्राप्त होवे ॥

 

अन्वयः-

हे देवा विद्वंसो वो युष्मभ्यं वयं विदथेषु यमनेहसं शंभुवं मंत्रं वोचेम तमिद्यूयं विजानीत। हे नरो यूयमिद्यदीमां वाचं प्रति हर्यथ तर्हि विश्वा सर्वा वामा प्रशस्तेयं वाक् वो युष्मानश्नवत् व्याप्नुयात् ॥


 

भावार्थः-

विद्वद्भिर्विद्याप्रचाराय सर्वेभ्यो मनुष्येभ्यो नित्यं सार्थाः सांगाः सरहस्याः सस्वरहस्तक्रिया वेदा उपदेष्टव्याः। यदि कश्चित्सुखमिच्छेत्संगेन वेदविद्यां प्राप्नुयात्। नैतया विना कस्यचित्सत्यं सुखं भवति। तस्मादध्यापकैरध्येतृभिश्च प्रयत्नेन सकला वेदा ग्राहयितव्या ग्रहीतव्याश्चेति ॥

विद्वानों को योग्य है कि विद्या के प्रचार के लिये मनुष्यों को निरन्तर अर्थ अंग उपांग रहस्य स्वर और हस्तक्रिया सहित वेदों को उपदेश करें और ये लोग अर्थात् मनुष्यमात्र इन विद्वानों से सब वेद विद्या को साक्षात् करें जो कोई पुरुष सुख चाहें तो वह विद्वानों के संग से विद्या को प्राप्त करें तथा इस विद्या के विना किसी को सत्य सुख नहीं होता इससे पढ़ने-पढ़ाने वालों को प्रयत्न से सकल विद्याओं को ग्रहण करना वा कराना चाहिये ॥

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