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Mantra Rig 01.040.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 40 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 20 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 62 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- बृहस्पतिः

छन्द: (Chhand) :- निचृदुपरिष्टाद् बृहती

स्वर: (Swar) :- मध्यमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वामिद्धि स॑हसस्पुत्र॒ मर्त्य॑ उपब्रू॒ते धने॑ हि॒ते सु॒वीर्यं॑ मरुत॒ स्वश्व्यं॒ दधी॑त॒ यो व॑ आच॒के

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते सुवीर्यं मरुत स्वश्व्यं दधीत यो आचके

 

The Mantra's transliteration in English

tvām id dhi sahasas putra martya upabrūte dhane hite | suvīryam maruta ā svaśvya dadhīta yo va ācake 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वाम् इत् हि स॒ह॒सः॒ पु॒त्र॒ मर्त्यः॑ उ॒प॒ऽब्रू॒ते धने॑ हि॒ते सु॒ऽवीर्य॑म् म॒रु॒तः॒ सु॒ऽअश्व्य॑म् दधी॑त यः वः॒ आ॒ऽच॒क्रे

 

The Pada Paath - transliteration

tvām | it | hi | sahasa | putra | martya | upa-brūte | dhane | hite | su-vīryam | maruta | ā | su-aśvyam | dadhīta | ya | va | ācakre 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।००।०२

मन्त्रविषयः-

पुनरेतैः परस्परं कथं वर्त्तितव्यमित्याह।

फिर ये लोग आपस में कैसे वर्त्ते, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्वाम्) (इत्) एव (हि) खलु (सहसः) शरीरात्मबलयुक्तस्य विदुषः (पुत्र) (मर्त्यः) मनुष्यः (उपब्रूते) सर्वां विद्यामुपदिशेत् (धने) विद्यादिगुणसमूहे (हिते) सुखसम्पादके (सुवीर्यम्) शोभनं वीर्यं पराक्रमो यस्मिँस्तत् (मरुतः) धीमन्तो जनाः (आ) समन्तात् (स्वश्व्यम्) शोभनेष्वश्वेषु विद्याव्याप्तविषयेषु साधुम्# (दधीत) धरत (यः) विद्वान् (वः) युष्मान् (आचके) सर्वतस्सुखैस्तर्प्पयेत् ॥२॥ #[‘तत्र साधुः’ अ ४।४।९८, इत्यनेन यत्प्रत्ययः। सं]

हे (सहसस्पुत्र) ब्रह्मचर्य और विद्यादि गुणों से शरीर आत्मा के पूर्ण बल युक्त के पुत्र ! (यः) जो (मर्त्यः) विद्वान् मनुष्य (त्वाम्) तुझको सब विद्या (उपब्रूते) पढ़ाता हो और हे (मरुतः) बुद्धिमान् लोगो ! आप जो (वः) आप लोगों को (हिते) कल्याण कारक (धने) सत्यविद्यादि धन में (आचके) तृप्त करे (इत्) उसीके लिये (स्वश्व्यम्) उत्तम विद्या विषयों में उत्पन्न (सुवीर्यम्) अत्युत्तम् पराक्रम को तुम लोग (दधीत) धारण करो ॥२॥ 

 

अन्वयः-

हे सहसस्पुत्र ! यो मर्त्यो विद्वांस्त्वामुपब्रूते हे मरुतो ! यूयं यो वो हिते धन आचके तस्मादेव* स्वश्व्यं वीर्यं यूयं दधत ॥२॥ *[तस्मादेव। सं]

 

 

भावार्थः-

मनुष्या अध्ययनाध्यापनादिव्यवहारेणैव परस्परमुपकृत्य सुखिनः सन्तु ॥२॥

मनुष्य लोग पढ़ने-पढ़ाने आदि धर्मयुक्त कर्मों ही से एक दूसरे का उपकार करके सुखी हों ॥२॥

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