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Mantra Rig 01.039.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 39 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 19 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 59 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- पथ्यावृहती

स्वर: (Swar) :- मध्यमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

असा॑मि॒ हि प्र॑यज्यव॒: कण्वं॑ द॒द प्र॑चेतसः असा॑मिभिर्मरुत॒ न॑ ऊ॒तिभि॒र्गन्ता॑ वृ॒ष्टिं वि॒द्युत॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

असामि हि प्रयज्यवः कण्वं दद प्रचेतसः असामिभिर्मरुत ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं विद्युतः

 

The Mantra's transliteration in English

asāmi hi prayajyava kava dada pracetasa | asāmibhir maruta ā na ūtibhir gantā vṛṣṭi na vidyuta 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

असा॑मि हि प्र॒ऽय॒ज्य॒वः॒ कण्व॑म् द॒द प्र॒ऽचे॒त॒सः॒ असा॑मिऽभिः म॒रु॒तः॒ नः॒ ऊ॒तिऽभिः॑ गन्त॑ वृ॒ष्टिम् वि॒ऽद्युतः॑

 

The Pada Paath - transliteration

asāmi | hi | pra-yajyava | kavam | d | pra-cetasa | asāmi-bhi | maruta | ā | na | ūti-bhi | ganta | vṛṣṭim | na | vi-dyutaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तच्छोधिताः प्रेरिताः किं किं साध्नुवन्तीत्युपदिश्यते।

फिर उनसे शोधे वा प्रेरे हुए वे क्या२ करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(असामि) संपूर्णम्। सामीति खण्डवाची। नसाभ्यसाभि (हि) खलु (प्रयज्यवः) प्रकृष्टो यज्युः परोपकाराख्यो यज्ञो येषां राजपुरुषाणां तत्संबुद्धौ (कण्वम्) मेधाविनं विद्यार्थिनम् (दद) दत्त। अत्र लोडर्थे लिट्। (प्रचेतसः) प्रकृष्टं चेतो ज्ञानं येषां ते (असामिभिः) क्षयरहिताभिः रीतिभिः। अत्र षैक्षय इत्यस्माद्बाहुलकादौणादिकोमिः प्रत्ययः। (मरुतः) पूर्णबला ऋत्विजः (आ) समन्तात् (नः) अस्मभ्यम् (ऊतिभिः) रक्षादिभिः (गन्त) गच्छत। अत्र दीर्घः। (वृष्टिम्) वर्षाः (न) इव (विद्युतः) स्तनयित्नवः ॥९॥

हे (प्रयज्यवः) अच्छे प्रकार परोपकार करने (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानयुक्त (मरुतः) विद्वान् लोगो ! तुम (असामिभिः) नाशरहित (ऊतिभिः) रक्षा सेना आदि से (न) जैसे (विद्युतः) सूर्य बिजुली आदि (वृष्टिम्) वर्षा कर सुखी करते हैं वैसे (नः) हम लोगों को (असामि) अखंडित सुख (दद) दीजिये (हि) निश्चय से दुष्ट शत्रुओं को जीतने के वास्ते (कण्वम्) और आप्त विद्वान् के समीप नित्य (आगन्त) अच्छे प्रकार जाया कीजिये ॥९॥

 

अन्वयः-

हे प्रयज्यवः प्रचेतसो मरुतो यूयं सामिभिरूतिभिर्न विद्युतो वृष्टिं #नारसामि सुखं सर्वस्मै दद हि किल शत्रुविजयाय कण्वमागन्त ॥९॥ #[‘नोऽसामि सुखं दद’। सं०।]

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारः। यथा मरुतः सूर्यविद्युतश्च वृष्टिं कृत्वा सर्वेषां प्राणिनां सुखाय विविधानि फलपत्रपुष्पादीन्युत्पादयन्ति। तथैव विद्वांसः सर्वेभ्यो मनुष्येभ्यो वेदविद्यां दत्त्वा सुखानि संपादयंत्विति ॥९॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे पवन सूर्य बिजुली आदि वर्षा करके सब प्राणियों के सुख के लिये अनेक प्रकार के फल, पत्र, पुष्प, अन्न आदि को उत्पन्न करते हैं वैसे विद्वान् लोग भी सब प्राणीमात्र को वेद विद्या देकर उत्तम-२ सुखों को निरन्तर संपादन करें ॥९॥

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