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Mantra Rig 01.039.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 39 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 18 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 54 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

न॒हि व॒: शत्रु॑र्विवि॒दे अधि॒ द्यवि॒ भूम्यां॑ रिशादसः यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ तना॑ यु॒जा रुद्रा॑सो॒ नू चि॑दा॒धृषे॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नहि वः शत्रुर्विविदे अधि द्यवि भूम्यां रिशादसः युष्माकमस्तु तविषी तना युजा रुद्रासो नू चिदाधृषे

 

The Mantra's transliteration in English

nahi va śatrur vivide adhi dyavi na bhūmyā riśādasa | yumākam astu taviī tanā yujā rudrāso nū cid ādhṛṣ

 

The Pada Paath (Sanskrit)

न॒हि वः॒ शत्रुः॑ वि॒वि॒दे अधि॑ द्यवि॑ भूम्या॑म् रि॒शा॒द॒सः॒ यु॒ष्माक॑म् अ॒स्तु॒ तवि॑षी तना॑ यु॒जा रुद्रा॑सः नु चि॒त् आ॒ऽधृषे॑

 

The Pada Paath - transliteration

nahi | va | śatru | vivide | adhi | dyavi | na | bhūmyām | riśādasa | yumākam | astu | taviī | tanā | yujā | rudrāsa | nu | cit | ādhṛṣ


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते कीदृशा भवेयुरित्युपदिश्यते।

फिर वे विद्वान् किस प्रकार के हों, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(नहि) निषेधार्थे (वः) युष्मान् (शत्रुः) विरोधी (विविदे) विंदेत् अत्र लिङर्थे लिट्। (अधि) उपरिभावे (द्यवि) प्रकाशे (न) निषेधार्थे (भूम्याम्) पृथिव्याम् (रिशादसः) रिशान् शत्रून् रोगान् वा समन्ताद्दस्यन्त्युपक्षयन्ति ये तत्सम्बुद्धौ (युष्माकम्) मनुष्याणाम् (अस्तु) भवतु (तविषी) प्रशस्तबलयुक्ता सेना (तना) विस्तृता (युजा) युनक्ति यया तया। अत्र कृतो बहुलम् इति करणे क्विप्। (रुद्रासः) ये रोदयन्त्यन्यायकारिणोजनांस्तत्सम्बुद्धौ (नु) क्षिप्रम् (चित्) यदि (आधृषे) समन्ताद् धृष्णुवन्ति यस्मिन् व्यवहारे तस्मै। अत्र पूर्ववत् क्विप् ॥

हे (रिशादसः) शत्रुओं के नाश कारक (रुद्रासः) अन्यायकारी मनुष्यों को रुलाने वाले वीर पुरुष ! (चित्) जो (युष्माकम्) तुम्हारे (आधृषे) प्रगल्भ होनेवाले व्यवहार के लिये (तना) विस्तृत (युजा) बलादि सामग्री युक्त (तविषी) सेना (अस्तु) हो तो (अधिद्यवि) न्याय प्रकाश करने में (वः) तुम लोगों को (शत्रुः) विरोधी शत्रु (नु) शीघ्र (नहि) नहीं (विविदे) प्राप्त हो और (भूम्याम्) भूमि के राज्य में भी तुम्हारा कोई मनुष्य विरोधी उत्पन्न न हो ॥

 

अन्वयः-

हे रिशादसो रुद्रासो वीरा चित् यदि युष्माकमाधृषे तना युजा तविष्यस्तु स्यात्तर्ह्यधि द्यवि न्यायप्रकाशे वो युष्मान् शत्रुर्नुनहि विविदे कदाचिन्न प्राप्नुयान्न भूम्यां भूमिराज्ये कश्चिच्छत्रूरुत्पद्येत ॥

 

 

भावार्थः-

यथा पवना अजातशत्रवः सन्ति तथा मनुष्या विद्याधर्मबलपराक्रमवन्तो न्यायाधीशा भूत्वा सर्वान्प्रशास्य दुष्टाञ्च्छत्रून् निवार्यादृष्टशत्रवः स्युः ॥

जैसे पवन आकाश में शत्रु रहित विचरते हैं वैसे मनुष्य विद्या, धर्म, बल, पराक्रम वाले न्यायाधीश हो सबको शिक्षा दे और दुष्ट शत्रुओं को दण्ड देके शत्रुओं से रहित होकर धर्म में वर्त्ते ॥

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