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Mantra Rig 01.039.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 39 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 18 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 53 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- अनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

परा॑ ह॒ यत्स्थि॒रं ह॒थ नरो॑ व॒र्तय॑था गु॒रु वि या॑थन व॒निन॑: पृथि॒व्या व्याशा॒: पर्व॑तानाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

परा यत्स्थिरं हथ नरो वर्तयथा गुरु वि याथन वनिनः पृथिव्या व्याशाः पर्वतानाम्

 

The Mantra's transliteration in English

parā ha yat sthira hatha naro vartayathā guru | vi yāthana vanina pthivyā vy āśā parvatānām 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

परा॑ ह॒ यत् स्थि॒रम् ह॒थ नरः॑ व॒र्तय॑थ गु॒रु वि या॒थ॒न॒ व॒निनः॑ पृ॒थि॒व्याः वि आशाः॑ पर्व॑तानाम्

 

The Pada Paath - transliteration

parā | ha | yat | sthiram | hatha | nara | vartayatha | guru | vi | yāthana | vanina | pthivyā | vi | āśā | parvatānām 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०३

मन्त्रविषयः-

अथ विद्वन्मनुष्यकृत्यमुपदिश्यते।

अब अगले मंत्र में विद्वान् मनुष्यों के कार्य का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(परा) प्रकृष्टार्थे (ह) किल (यत्) ये (स्थिरम्) दृढं बलम् (हथ) भग्नांगाञ्च्छत्रून् कुरुथ (नरः) नेतारो मनुष्याः (वर्तयथ) निष्पादयथ। अत्रान्येषामपि० इति दीर्घः। (गुरु) गुरुत्वयुक्तं न्यायाचरणं पृथिव्यादिकं द्रव्यं वा (वि) विविधार्थे (याथन) प्राप्नुथ। अत्र तप्तनत्पन० इति थस्य स्थाने थनादेशः। (वनिनः) वनं रश्मिसंबन्धो विद्यते येषान्ते वायवः। अत्र सम्बन्धार्थ इनिः। (पृथिव्याः) भूगोलस्यान्तरिक्षस्य वा (वि) विशिष्टार्थे (आशाः) दिशः। आशा इति दिङ्नामसु पठितम्। निघं० १।। (पर्वतानाम्) गिरीणां मेघानां वा ॥३॥

हे (नरः) नीति युक्त मनुष्यो ! तुम जैसे (वनिनः) सम्यक् विभाग और सेवन करनेवाले किरण सम्बन्धी वायु अपने बल से (यत्) जिन (पर्वतानाम्) पहाड़ और मेघों (पृथिव्याः) और भूमि को (व्याशाः) चारों दिशाओं में व्यासवत् व्याप्त होकर उस (स्थिरम्) दृढ़ और (गुरु) बड़े-२ पदार्थों को धरते और वेग से वृक्षादि को उखाड़ के तोड़ देते हैं वैसे विजय के लिये शत्रुओं की सेनाओं को (पराहथ) अच्छे प्रकार नष्ट करो और (ह) निश्चय से इन शत्रुओं को (विवर्त्तयथ) तोड़-फोड़ उलट-पलट कर अपनी कीर्त्ति से (आशाः) दिशाओं को (वियाथन) अनेक प्रकार व्याप्त करो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे नरो नायका यूयं यथा वनिनो वायवो यत्पर्वतानां पृथिव्याश्च व्याशाः सन्तः स्थिरं गुरु हत्वा नयन्ति तथा तत्स्थिरं गुरु बलं संपाद्य शत्रून् पराहथ ह किलैतान् विवर्त्तयथ विजयाय वायुवच्छत्रुसेनाः शत्रुपुराणि वा वियाथ ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा वेगयुक्ता वायवो वृक्षादीन् भंजते पृथिव्यादिकं धरन्ति तथा धार्मिका न्यायाधीशा अधर्म्माचरणानि भङ्त्वा धर्म्येण न्यायेन प्रजा धरेयुः सेनापतयश्च महत्सैन्यं धृत्वा शत्रन् हत्वा पृथिव्यां चक्रवर्त्तिराज्यं संसेव्य सर्वासु दिक्षु सत्कीर्त्तिं प्रचारयन्तु यथा सर्वेषां प्राणाः प्रियाः सन्ति तथैते विनयशीलाभ्यां प्रजासु स्युः ॥३॥ [प्रियाः। सं]

इस मंत्र में वाचक लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वेगयुक्त वायु वृक्षादि को उखाड़ तोड़-झंझोड़ देते और पृथिव्यादि को धरते हैं वैसे धार्मिक न्यायाधीश अधर्माचारों को रोक के धर्मयुक्त न्याय से प्रजा को धारण करें और सेनापति दृढ़ बल युक्त हो उत्तम सेना का धारण शत्रुओं को मार पृथिवी पर चक्रवर्त्ति राज्य का सेवन कर सब दिशाओं में अपनी उत्तम कीर्त्ति का प्रचार करें और जैसे प्राण सबसे अधिक प्रिय होते हैं वैसे राज पुरुष प्रजा को प्रिय हों ॥३॥

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