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Mantra Rig 01.039.002

 

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 39 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 18 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 52 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- विराट्सतःपङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स्थि॒रा व॑: स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑ यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिन॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः

 

The Mantra's transliteration in English

sthirā va santv āyudhā parāude vīū uta pratikabhe | yumākam astu taviī panīyasī mā martyasya māyina 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स्थि॒रा वः॒ स॒न्तु॒ आयु॑धा प॒रा॒ऽनुदे॑ वी॒ळु उ॒त प्र॒ति॒ऽस्कभे॑ यु॒ष्माक॑म् अ॒स्तु॒ तवि॑षी पनी॑यसी मा मर्त्य॑स्य मा॒यिनः॑

 

The Pada Paath - transliteration

sthirā | va | santu | āyudhā | parānude | vīu | uta | prati-skabhe | yumākam | astu | taviī | panīyasī | mā | martyasya | māyinaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०२

मन्त्रविषयः-

अथैतेभ्य उपदिश्याशीर्दत्वा युष्माभिः किं किं साधनीय मित्युपदिश्यते।

अब ईश्वर इनको उपदेश और आशीर्वाद देकर सबसे कहता है, कि तुमको क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(स्थिरा) स्थिराणि चिरं स्थातुमर्हाणि। अत्र सर्वत्र शेश्छन्दसि इति लोपः। (वः) युष्माकम् (सन्तु) भवन्तु (आयुधा) आयुधान्याग्नेयानि धनुर्वाणभुसुंडीशतघ्न्यादीन्यस्त्रशस्त्राणि (पराणुदे) परान्नुदन्ति शत्रून्यस्मिन्युद्धे तस्मै। अत्र कृतो बहुलम् इत्यधिकरणे क्विप्। (वीळू) वीडूनि दृढानि बलकारीणि। अत्र ईषाअक्षादित्वात्प्रकृतिभावः। (उत) अप्येव (प्रतिष्कमे) प्रतिष्कंभते प्रतिबध्नाति शत्रून्येन कर्मणा तस्मै। अत्र सौत्रात् स्कम्भुधातोः पूर्ववत् क्विप्। (युष्माकम्) धार्मिकाणां वीराणाम् (अस्तु) भवतु (तविषी) प्रशस्तबलविद्यायुक्ता सेना। तवेर्णिद्वा। उ० १।४९। अनेन टिषच् प्रत्ययो णिद्वा। तविषीति बलनामसु पठितम्। निघं० २।९। (पनीयसी) अतिशयेन स्तोतुमर्हा व्यवहारसाधिका (मा) निषेधार्थे (मर्त्यस्य) मनुष्यस्य (मायिनः) कपटधर्माचरणयुक्तस्य। माया कुत्सिता प्रज्ञा विद्यते यस्य तस्य। अत्र निंदार्थ इनिः। मायेति प्रज्ञानामसु पठितम् निघं० ३।९। ॥२॥

हे धार्मिक मनुष्यो ! (वः) तुम्हारे (आयुधा) आग्नेय आदि अस्त्र और तलवार, धनुष् बाण, भुसुंडी (बन्दूक) शतघ्नी (तोप) आदि शस्त्र अस्त्र (पराणुदे) शत्रुओं को व्यथा करनेवाले युद्ध (उत) और (प्रतिष्कमे) रोकने बांधने और मारने रूप कर्मों के लिये (स्थिरा) स्थिर दृढ़ चिरस्थायी (वीळू) दृढ़ बड़े-२ उत्तम युक्त (तविषी) प्रशस्त सेना (पनीयसी) अतिशय करके स्तुति करने योग्य व व्यवहार को सिद्ध करने वाली (अस्तु) हो और पूर्वोक्त पदार्थ (मायिनः) कपट आदि अधर्माचरण युक्त (मर्त्यस्य) दुष्ट मनुष्यों के (मा) कभी मत हों ॥२॥

 

अन्वयः-

हे धार्मिकमनुष्या व आयुधा शत्रूणां पराणुद उत प्रतिष्कभे स्थिरावीळू सन्तु। युष्माकं तविषी सेना पनीयस्यन्तु मायिनो मर्त्यस्य मा सन्तु ॥२॥

 

 

भावार्थः-

धार्मिका मनुष्या एवेश्वरानुग्रहविजयौ प्राप्नुवन्ति ईश्वरोपि धर्मात्मभ्य एवाशीर्ददाति नेतरेभ्यः एतैः प्रशस्तानि शस्त्रास्त्राणि रचयित्वा तत्प्रक्षेपाभ्यासं कृत्वा प्रशस्तां सेना शिक्षित्वा दुष्टानां शत्रूणां बधनिरोधपराजयान्कृत्वा न्यायेन नित्यं प्रजारक्ष्या नेदं मायावी प्राप्तुं कर्त्तुं शक्नोति ॥२॥

धार्मिक मनुष्य ही परमात्मा के कृपा पात्र होकर सदा विजय को प्राप्त होते हैं दुष्ट नहीं। परमात्मा भी धार्मिक मनुष्यों ही को आशीर्वाद देता है पापियों को नहीं। पुण्यात्मा मनुष्यों को उचित है कि उत्तम-२ शस्त्र-अस्त्र रचकर उनके फेंकने का अभ्यास करके सेना को उत्तम शिक्षा देकर शत्रुओं का निरोध वा पराजय करके न्याय से मनुष्यों की निरन्तर रक्षा करनी चाहिये# ॥२॥ #[ सं भा के अनुसार इसके आगे ‘इन शस्त्रादि पदार्थों को छली मनुष्य नहीं प्राप्त कर सक्ता’ इतना वाक्य और होना चाहिये। सं]

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