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Mantra Rig 01.039.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 39 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 18 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 51 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- पथ्यावृहती

स्वर: (Swar) :- मध्यमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

प्र यदि॒त्था प॑रा॒वत॑: शो॒चिर्न मान॒मस्य॑थ कस्य॒ क्रत्वा॑ मरुत॒: कस्य॒ वर्प॑सा॒ कं या॑थ॒ कं ह॑ धूतयः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

प्र यदित्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ कस्य क्रत्वा मरुतः कस्य वर्पसा कं याथ कं धूतयः

 

The Mantra's transliteration in English

pra yad itthā parāvata śocir na mānam asyatha | kasya kratvā maruta kasya varpasā ka yātha ka ha dhūtaya 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

प्र यत् इ॒त्था प॒रा॒ऽवतः॑ शो॒चिः मान॑म् अस्य॑थ कस्य॑ क्रत्वा॑ मरुतः॑ कस्य॑ वर्प॑सा कम् या॒थ॒ कम् ह॒ धू॒त॒यः॒

 

The Pada Paath - transliteration

pra | yat | itthā | parāvata | śoci | na | mānam | asyatha | kasya | kratvā | maruta | kasya | varpasā | kam | yātha | kam | ha | dhūtayaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०१

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते विद्वांसः कथं-२ संवदन्त इत्युपदिश्यते।

अब उनतालिसवें सूक्त का आरंभ है। फिर वे विद्वान् लोग परस्पर किस-२ प्रकार संवाद करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(प्र) प्रकृष्टार्थे (यत्) ये (इत्था) अस्माद्धेतोः (परावतः) दूरात् (शोचिः) सूर्यज्योतिः पृथिव्याम् (न) इव (मानम्) यत्परिमाणम् (अस्यथ) प्रक्षिपत (कस्य) सुखस्वरूपस्य परमात्मनः (क्रत्वा) क्रतुना कर्मणा ज्ञानेन वा। अत्र जसादिषु छन्दसि वा वचनम्# इति नादेशाभावः। (मरुतः) विद्वांसः (कस्य) सुखदातुर्भाग्यशालिनः (वर्पसा) रूपेण। वर्प इति रूपनामसु पठितम् निघं० ३।। (कम्) सुखप्रदं देशम् (याथ) प्राप्नुत (कम्) सुखहेतुं पदार्थम् (ह) खलु (धूतयः) ये धून्वन्ति ते। क्तिच् क्तौ च संज्ञायाम्। ३।३।१७४। इति क्तिच् ॥१॥ #[अ ७।३।१०९। सूत्रस्थ वार्तिकेन। सं०]

हे (मरुतः) विद्वान् लोगो ! आप (यत्) जो (धूतयः) सबको कंपाने वाले वायु (शोचिर्न) जैसे सूर्य की ज्योति और वायु पृथिवी पर दूर से गिरते हैं इस प्रकार (परावतः) दूर से (कस्य) किसके (मानम्) परिमाण को (अस्यथ) छोड देते (इत्था) इसी हेतु से (कस्य) सुखस्वरूप परमात्मा के (क्रत्वा) कर्म वा ज्ञान और (वर्पसा) रूप के साथ (कम्) सुखदायक देश को (याथ) प्राप्त होते हो इन प्रश्नों के उत्तर दीजिये ॥१॥

 

अन्वयः-

हे मरुतो यूयं यद्ये धूतयो वायव इव शोचिर्न परावतः कस्य मानमस्यथ। इत्था ह कस्य क्रत्वा वर्पसा च कं याथचेति समाधानानि ब्रूत ॥१॥


 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। सुखमभीप्सुभिर्विद्वद्भिर्जनैर्यथा सूर्यस्य रश्मयो दूरदेशाद्भूमिं प्राप्य पदार्थान् प्रकाशयन्ति तथैव सर्वसुखदातुः परमात्मनो भाग्यशालिनः परभविदुषश्च सकाशाद्वायोगुणकर्मस्वभावान्याथातथ्यतो विज्ञाय तेष्वेव रमणीयं वायवः कारणमानं कारणस्वरूपेण यान्तीति विजानी ॥१॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। सुख की इच्छा करनेवाले विद्वान् पुरुषों को चाहिये कि जैसे सूर्य की किरणें दूर देश से भूमि को प्राप्त होकर पदार्थों को प्रकाश करती हैं वैसे ही अभिमान को दूर से त्याग के सब सुख देने वाले परमात्मा और भाग्यशाली परमविद्वान्* के गुण, कर्म, स्वभाव और मार्ग को ठीक-२ जानके उन्हीमें रमण करें ये वायु कारण से आते कारणस्वरूप से स्थित और कारण में लीन भी हो जाते हैं ॥१॥ *[संस्कृत भाष्य के अनुसार-परम विद्वान् से वायु के। सं]

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