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Mantra Rig 01.038.014

MANTRA NUMBER:

Mantra 14 of Sukta 38 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 17 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 49 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- यवमध्याविराड्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

मि॒मी॒हि श्लोक॑मा॒स्ये॑ प॒र्जन्य॑ इव ततनः गाय॑ गाय॒त्रमु॒क्थ्य॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः गाय गायत्रमुक्थ्यम्

 

The Mantra's transliteration in English

mimīhi ślokam āsye parjanya iva tatana | gāya gāyatram ukthyam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

मि॒मी॒हि श्लोक॑म् आ॒स्ये॑ प॒र्जन्यः॑ऽइव त॒त॒नः॒ गाय॑ गा॒य॒त्रम् उ॒क्थ्य॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

mimīhi | ślokam | āsye | parjanya-iva | tatana | gāya | gāyatram | ukthyam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।१४

मन्त्रविषयः-

पुनस्तत्पाठितो विद्यार्थी कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते।

फिर उस विद्वान् का पढ़ाया शिष्य कैसा होना चाहिये, इसका उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(मिमीहि) निर्मिमीहि। माङ्माने शब्देचेत्यस्य रूपम् व्यत्ययेन परस्मैपदम्। (श्लोकम्) वेदशिक्षायुक्तां वाणीम्। श्लोक इति वाङ्नामसु पठितम्। निघं० १।११। (आस्ये) मुखे (पर्जन्य इव) यथा मेघो गर्जनं कुर्वन्वृष्टिं तनोति (ततनः) विस्तारय। लेटि मध्यमैकवचने तनु विस्तार इत्यस्य रूपम्। विकरणव्यत्ययेन ओः श्लुः। (गाय) पठ पाठय वा (गायत्रम्) गायत्रीछन्दस्कम् (उक्थ्यम्) गातुं वक्तुं योग्यम् ॥१४॥

हे विद्वान् मनुष्य ! तू (आस्ये) अपने मुख में (श्लोकम्) वेद की शिक्षा से युक्त वाणी को (मिमीहि) निर्माण कर और उस वाणी को (पर्जन्य इव) जैसे मेघ वृष्टि करता है वैसे (ततनः) फैला और (उक्थ्यम्) कहने योग्य (गायत्रम्) गायत्री छन्द वाले स्तोत्ररूप वैदिक सूक्तों को (गाय) पढ़ तथा पढ़ा ॥१४॥

 

अन्वयः-

हे विद्वन् मनुष्य त्वमास्य श्लोकं मिमीहि तं च पर्जन्य इव ततनः। उक्थ्यं गायत्रं च गाय ॥१४॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। हे विद्वद्भ्योधीतविद्या मनुष्या युष्माभिः सर्वथा प्रयत्नेन स्वकीयां वाणीं वेदविद्यासुशिक्षितां कृत्वा वाचस्पत्यं संपाद्य परमेश्वरस्य वाय्वादीनां च गुणाः स्तोतव्याः श्रोतव्या उपदेशनीयाश्च ॥१४॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानों से विद्या पढ़े हुए मनुष्यों ! तुम लोगों को उचित है कि सब प्रकार प्रयत्न के साथ वेद विद्या से शिक्षा की हुई वेदवाणी से वाणी के वेत्ता के समान वक्ता होकर वायु आदि पदार्थों के गुणों की स्तुति तथा उपदेश किया करो ॥१४॥

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